Monday, September 22, 2014

'स्पर्श..'






...

"सुना है..
तुम्हारा कंठ बहुत मधुर है..
रूई के फाये से कोमल स्वर..
मिश्री-सा आलाप..

स्पर्श स्नेह से परिपूर्ण हैं..
उंगलियाँ थपथपाती हैं..
मस्तिष्क में उलझे गरिष्ठ प्रश्न..

सामीप्य चाहता हूँ..
विषम परिस्तिथि से निजात भी..
और..सहज सुखद वायुमंडल..

क्या संभव है..
प्रवेश मेरा..
आज आपके द्वार..!!"

...

--वीकेंड जाने का मलाल..जाने क्या-क्या लिखवा गया..

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