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"प्रिय मित्र..
यूँ अंतर्मन की लकीरों को आपसे बेहतर कौन पढ़ सकता है..?? इन आड़ी-तिरछी बेबाक़..अशांत..अविरल लहरों का माप और ताप..न मैं कभी समझ सकी..शायद ही न कभी समझ सकूँ..
उदासी घेरती है जब कभी..नाम आपका ही गूँजता चला जाता है..वीरानी से पौलिशड स्याह दीवारों पर.. कितनी ही रातें गुज़र जातीं हैं..फ़क़त..हासिल इक लम्हे की नींद भी नहीं..
आपसे मिलने से पहले..तनहा थी..दुनिया की भीड़ से जुदा थी.. और ख़ुद को जानने की ख्वाहिश अनजान थी..
शब्दों की हेरा-फेरी में..मेरा दिल क़ैद हो गया..
आपको पत्र लिखने का प्रयत्न भी विफल होने लगा.. असंवेदनशीलता अपने चरम स्तर पर है..और मैं अपने पर्सनल और प्रोफेशनल स्फेहर में लोयेस्ट पॉइंट पर हूँ..
कौनसी ख़लिश है..कौनसा जुनूं है..कौनसी उल्फ़त है..कौनसी तिशनगी है....बता दीजिये..आप..!! जानती हूँ..भलीभांति कि आपकी पारखी नज़र सब जानतीं हैं..
मेरे मन की दहलीज़ कौनसे जवाब ढूँढ रही है..और मेरी साँसें क्यूँ मुरझाने लगीं हैं..??? आप जानते हैं न..ये सारे अनकहे सवाल मेरे मन के..पढ़ लीजिये न..मेरी कोशिकाओं की अनहर्ड स्टोरी..
हेल्प मी थ्रू..My Saviour...यू नो इट वैल..यू आर My Only Refuge..!!!"
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बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (28-10-2014) को "माँ का आँचल प्यार भरा" (चर्चा मंच-1780) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
छठ पूजा की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद मयंक साब..
ReplyDeleteसादर आभार..!!
बहुत शिद्दत ...
ReplyDeleteधन्यवाद दिगम्बर नास्वा जी..!!
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