
...
"रेतीले समंदर..
लाइवली किनारे..
एक लॉन्ग वाक..
एक स्ट्रांग बांड..
ख़ामोशी के फेरे..
लेते रहे हम..
धड़क-धड़क..
एंडलैस गूज़बम्ज़..
कभी नज़रें मिलाना..
कभी शरमा जाना..
बिन कहे..
सब पढ़ आना..
बिन सुने..
सब जान जाना..
बारिश की बूँदों से..
हौले-हौले मुस्कुराना..
होंठों का यूँ ही..
हलके-से कंपकंपाना..
मेरी रूह को..
लैवल कर जाना..
बिन क़ुओएशचन..
मेरे क़ुओएशचनज़..
अपनाते जाना..
कौन जानेगा..
तुम से बेहतर..
इस केओस में..
मुझे ढूँढ लाना..
थैंक्स..इस साइलैंट जर्नी पर..
मेरा साथ देने के लिए..
मुझे ख़ुद से इंट्रोड्यूज़..
करवाने के लिए..
मुझे..
तुमसे मिलवाने के लिए..
लव यू..!!"
...
--शुक्रिया..
Nice..beautifully written
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद..आशुतोष जी..!!
ReplyDeleteशब्दों की मर्मज्ञ तुम...
ReplyDeleteपकड़ लेती हो अर्थों को...
.
वे सांस लेते है...
हम जी लेते है...
साधुवाद....
हार्दिक धन्यवाद प्रतिभा के पन्ने जी..!!
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