
#जां
...
"सुना है..
तुम 'लव-गुरु' हो..
पल में ही लोगों की मुश्किलें हर देते हो..
कोई ब्रेक-अप हो..
या..
हो इश्क़ में मोराल डाउन..
कोई टीनएजर हो..
या..
मिड २०ज़ के डिलेमा वाला..
कोई अधेड़ तलाशता हो साथी नया..
या..
कोई अपने बिछड़े बीलवेड की यादें संजोता..
सबको कम्फर्ट करते-करते..
अपने एहसास भूल गये..शायद..
रूह के छोर पे..
देखो..उग आये हैं..
कितने स्याह जामुन..
आओ न..#जां..
मैं चखकर देती हूँ..
वो 'मीठे एहसास'..
के ज़बां पे आने दो..
मेरे रस की बूँदें..
मेरी उल्फ़त के निशां..
दिन भर दुनिया से छुपा..
घूमते रहना..चाहे जहाँ..!!"
...
--गाढ़े रंग..मुहब्बत वाले..
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-05-2016) को "अबके बरस बरसात न बरसी" (चर्चा अंक-2345) पर भी होगी।
ReplyDelete--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सुन्दर मीठे एहसास !
ReplyDeleteखूबसूरत एहसास!
ReplyDeleteखूबसूरत एहसास!
ReplyDeleteसुन्दर अहसास
ReplyDeleteसादर आभार, मयंक साब.. देरी के लिए क्षमा..
ReplyDeleteऋता शेखर मधु जी..
ReplyDeleteसादर आभार..देरी के लिए क्षमा..
वाणी गीत जी..
ReplyDeleteहार्दिक आभार..देरी के लिए क्षमा..
धन्यवाद रश्मि शर्मा जी..देरी के लिए क्षमा..
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