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"तुम मेरे अंतर्मन को सींचते हो उस घूँट से, जो लिखा था दर्द की रात में..
तुम प्रेम की तरह इश्क़ पर परत चढ़ाते हो पराली की, जिसे जलना ही होगा इस मर्तबा भी..
तुम सितारों को ढालते हो उन निष्ठुर कठोर साँचों में, जहाँ मोल छालों का लगता है..
तुम मेरे रुआब को पैना करते हो उस कैफ़ियत से, जहाँ सामान मकां हो जाता है..
तुम मेरे तिलिस्म का सच हो..
तुम मेरी रुबाई का फाया हो..
तुम मेरे अल्फ़ाज़ का जिस्म हो..
तुम मेरी आयतों का गुमां हो..
तुम दिलबर हो..!!"
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