"और मुझे लिखने थे किस्से..कभी दर्द के, फ़रेब के, इस्तेमाल किए जाने के, आउटसाइडर ट्रीट किए जाने के, डंप हुए जाने के और यह भी जतलाये जाने के कि "तुम हो ही कौन?? क्या वजूद?? क्या ठिकाना? क्या शौहरत??? क्या रुतबा??"...
पर कुछ तो है ज़िंदगी में, कुछ दोस्त ऐसे मिले, वक़्त की आंधियाँ भी अपना ज़ोर न दिखा सकीं..
वो दिलदार, जो शामो-सहर थामे रहे मशाल-ए-हौंसला..
वो बेहतरीन सौदागर, जो रोशनी की सुबह से राब्ता करवाते रहे.. वो मज़बूत दरख़्त, जो छाँव में अपनी सींचते रहे..
वो इंद्रधनुषी खजाने, जो मंज़र संवारते रहे..
वो चमकीले सितारे, जो अपनी नरम सेज पर सहलाते रहे..
वो अज़ीज़ मेहमां, जो मेरा ठौर हो गए..
तो भुला दूँ वो जो अपना था ही नहीं कभी..या सहज ही सिमट जाऊँ?? या बाँध दूँ कलाई पर वादे सारे या संग हो जाऊँ??
तुम ही कहो, ए-दोस्त.. किस शज़र जाऊँ..!!"
...
--#बस यूँ ही..
कौन अपना कौन पराया आजकल सरल नहीं रहा इसे समझना। .
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 09 अगस्त 2022 को साझा की गयी है....
ReplyDeleteपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
बाँध दो कलाई पर वादे सारे
ReplyDeleteसामने वाले का निभाना या नहीं निभाना उसकी मर्जी
मार्मिक बातें
बेहतरीन
ReplyDeleteशज़र तो एक ही स्थान पर रहता है , दृढ़ता से .... विभाजी ने सही सुझाव दिया है । बेहतरीन अभव्यक्ति ।
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteआदरणीया कविता रावत जी,
ReplyDeleteसादर आभार..
आदरणीया यशोदा अग्रवाल जी,
ReplyDeleteबहुत आभार..
आदरणीया महोदया विभा रानी श्रीवास्तव जी,
ReplyDeleteसादर धन्यवाद..
आदरणीया सब्गीता आंटी,
ReplyDeleteसादर आभार हर बार यूँ प्रोत्साहित करने का..
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