
...
"रूह को बांटा था..जिस दिन..
सुलगी थी ओस भी..उस दिन..
फिजायों में महकी-सी खुशबू..
कैसे चलतीं इक कदम..तुम बिन..
चाँदनी में भीगी..साँसों में घुली...
फ़क़त..बेमानी थी..तुम बिन..
गुरूर था..फलक को तारों पर..
कैसे सिमटीं थीं रातें..तुम बिन..
कब तक छुपाऊं..वो काजल..
जलता नहीं..जो..तुम बिन..
कैसे मिटाऊं..कलाई का निशाँ..
काटा था..जुदा हो..उस दिन..!"
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बेहतरीन बहुत खूब लिखा है आपने ..अच्छा लगा शुक्रिया
ReplyDeleteधन्यवाद रंजना जी..!!
ReplyDeletewah bahut khoob likhaa he. os ka sulgana..tum bin yaani yaani jis 'aakaash' (khaalipan) ki aour sanket he vo rachna me saarthak roop se ingeet hote he, yahi is rachna ki safaltaa he.
ReplyDeleteधन्यवाद अमिताभ जी..!!
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