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"डूबी है रंग में आज रुबाई..
चलो..
फिर सैर पर चलें..
बिछी थीं..
मुस्कराहट की सुगंध..
तन की अभिलाषा..
जहाँ..
उगता था दिनकर..
साथ जीवन परिभाषा..
मद्धम उजाला..
इन्द्रधनुषी जिज्ञासा..
प्रेम आदर विनम्रता..
बहती थी हर क्षण..
संस्कारों की भाषा..
खुशहाली की चादर..
करती तृप्त पिपासा..
चलो..
खोज लायें..
दूरियां पाटने वाली..
रसीली मधुशाला..!!"
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sunder madhusala ki abhivaykti....
ReplyDeleteबहुत ही खूबसूरती से मधुशाला को और भी सुंदर बना दिया आपने...
ReplyDeleteधन्यवाद सागर जी..!!!
ReplyDeletebahut hi sundar rachna mam....
ReplyDeletepahli baar apke blog par aaya hun, padhkar acha laga . aaj se hi follow kar raha hun apko..
jjai hindjai bharat
धन्यवाद सजन आवारा जी..!!
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