
हमारी ऑनलाइन मित्र..'दी' की एक रचना पढ़ कर..बरबस ही यह शब्द उभर आये..!!!
आपके लिये..'दी'..
...
"जश्न-ए-बेवफाई..
मुश्किल ना था..
जो ना गुज़र सका..
साहिल ही था..
बैठ आगोश..
देखे होंगे सपने बेशुमार..
अपना बना ना सका..
उसे बता ना सका..
खरोंचती है..
खुदाई बहुत..
काश..
ना निभाता..
वादे की वो कसम..
ना उठाता..
राज़ से नक़ाब..
बेहतर होता..
बेवफ़ा ही कहते..
वाईज़..!!"
...
धन्यवाद यशवंत माथुर जी..!!
ReplyDeleteबहुत ही खुबसूरत....
ReplyDeletebhaut hi sunder panktiya...
ReplyDeleteइज्ज़त अफ्जाई का शुक्रिया...प्रियंका .मेरे लिखे से तुम्हारा लिखा कहीं बेहतर है...ढेर सारा प्यार,तुम्हें...ऐसा ही लिखती रहो.
ReplyDeleteधन्यवाद सुषमा 'आहुति' जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद सागर जी..!!!
ReplyDeleteधन्यवाद दी..!!
ReplyDeleteआप यूँ ही स्नेह-रस बरसाते रहिये..!!! और रही बात..आपसे अच्छा लिखने की..आप आदरणीया हैं मेरे लिये..मेरी गुरु..!!!
बस अपनी आँचल की छाँव में यूँ ही रखियेगा..!!
बहुत सुन्दर रचना ..
ReplyDeleteधन्यवाद रेखा जी..!!
ReplyDeleteबहुत खूबसूरत रचना
ReplyDeleteधन्यवाद संगीता आंटी..!!
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