Sunday, September 11, 2011

'मेरे हयात..'



...

"उठी है..
टीस कोई..

जिस्म से बहते..
लफ्ज़ कई..

मोड़ सकूँ जो..
यादों का पुलिंदा..

है कसम..
मेरे हयात..

ना थामना..
लकीरों का कसीदा..!!"

...

11 comments:

  1. काफी दिनों बाद आपका कुछ पढने को मिला... और हमेसा की तरह बहुत ही अच्छी....

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  2. बहुत बहुत खूब

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  3. आप शब्दों में जादू भर देतीं हैं,प्रियांकभिलाषी जी.

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

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  4. यादों का पुलिंदा जब मोडना सीख लेना,कायदे से...तो मुझे भी सिखाना,छोटी बहना !

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  5. धन्यवाद सुषमा 'आहुति' जी..!!!

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  6. धन्यवाद सागर जी..!!

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  7. धन्यवाद शेफाली जी..!!

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  8. धन्यवाद उड़न तश्तरी जी..!!

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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!