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"तुम समझते हो बेकार हूँ मैं, किसी लायक नहीं.. सच ही कहती हो तुम.. कोई गुल की खुशबू सहेज ना सका अब तलक..कोई दामन रंगीं ना कर सका..
तुम क्या जानो..तुम बिन गुज़री उन वीरान रातों में कितनी मर्तबा बाँटा था रूह का हर कोना-एक कोना तुम्हारी यादों का, दूजा बेशुमार चाहत के कैनवास का, तीजा मदहोश करती तुम्हारी आवाज़ से लबरेज़ उन हर्फों का, चौथा तुम्हारी गिरफ्त में क़ैद *वाफ़िर साँसों की बेताब **तिजारत का..
तुम क्या जानो..मेरी वफ़ा के माने..
संग की सिलवटें..बहलातीं नासूर पुराने..!!"
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*वाफ़िर = ढ़ेर/abundant
**तिजारत = traffic
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