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"मौत का फ़रमान भी अजीब-सा था इस दफ़ा.. पिछली कई मौतें यूँ भी जी आई थी, ना बाँध सकी थी कोई रिश्ता तेरी ऊँगली के पोरों से, ना तोड़ सकी थी रूह का लिहाफ़ तेरी बेरुखी से..!! क्यूँ बारहां भूल जाती हैं रेत की चादरें वजूद अपना, जबकि उनसे ही नखलिस्तान का क़द ज़िंदा रह पता है..!!
क्यूँ समझते नहीं महबूब..उनसे ही नहीं जुस्तजू कायम..
और भी हैं दर-ए-क़फ़स..मरती मिटती आरज़ू हर नफ्ज़..!!"
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