Monday, March 24, 2014

'वाज़िब दूरियां..'






...


"कितना कुछ कहती रही..
जाने क्या सहती रही..

ख़ामोश रूमानियत..फ़क़त..
दरिया-सी बहती रही..

वाज़िब दूरियां..बन लहू..
साँसों में रहती रही..!!"


...

6 comments:

  1. गहरे भाव समेटे लाजवाब रचना। बधाई।

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद मिथिलेश दुबे जी..!!

    ReplyDelete
  3. धन्यवाद प्रसन्ना बडन चतुर्वेदी जी..!!

    ReplyDelete
  4. धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!

    ReplyDelete

स्वागत है..आपके विचारों का..!!!