
...
"जाने कब क्या समझ सकूँगी..
जो न समझी परतों की परत..
गम-ए-दरीचा कैसे समझ सकूँगी..
कहते वाईज़..इनायत तुमपे भी होगी..
जो न लिखा..वो कैसे समझ सकूँगी..
होने लगे फ़ीके..लफ्ज़ मेरे..इस कदर..
दर्द-ए-जानिब दर्द..अब कैसे समझ सकूँगी..
मिटा दो..नामों-निशां..रूह से अपनी..
पाठ-ए-मोहब्बत..कैसे समझ सकूँगी..
लिख रही हूँ..जाने क्या-क्या..सच है..
रदीफ़..मतला..बहर..कैसे समझ सकूँगी..!!"
...
--आपकी इनायत का कलाम कलम हो गया..
धन्यवाद यशोदा अग्रवाल जी..!!!
ReplyDeleteसादर आभार..!!
लाजवाब। जितनी बार आपको पढता हूँ उतनी बार अलग अनुभूति होती है।
ReplyDeleteसुन्दर
ReplyDeleteसुन्दर भाव और अतिसुन्दर रचना
ReplyDeleteकल 06/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक एक बार फिर होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
ReplyDeleteधन्यवाद !
धन्यवाद ओंकार जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद राजीव कुमार झा जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद मयंक साब..!!
ReplyDeleteसादर आभार..!!
सुन्दर रचना
ReplyDeleteधन्यवाद ओंकार जी..!!
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना...
ReplyDeleteबहुत खूब ... लाजवाब रचना ,,,
ReplyDeleteधन्यवाद Vaanbhatt जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद दिगम्बर नासवा जी..!!
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