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"आसूँ जो बहते हैं..नज़र नहीं पाते..
मेरे घर सैलानी परिंदे नहीं आते..१..
आया करो..फ़क़त बाँध गमे-गठरी..
सुनो..दिन गिरफ़्त के रोज़ नहीं आते..२..
जानता हूँ..साज़िशें औ' क़वायद उनकी..
नक़ाब पे उल्फ़त वाले रंग नहीं आते..३..
गुलज़ार रहे ताना-बाना..सुर-ताल के..
क़द्रदान..नमकीं समंदर में नहीं आते..४..!!!"
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--रॉ स्टफ..
हर शेर उम्दा ...
ReplyDeleteधन्यवाद मोहन सेठी 'इंतज़ार' जी..!!
ReplyDeleteसादर आभार मयंक साब..!!
ReplyDeleteवाह
ReplyDeleteवाह वाह वाह
ReplyDeleteहर शेर जुदा अंदाज़ का ... बहुत उम्दा ...
ReplyDeleteबहुत ख़ूब
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद..सुशील कुमार जोशी जी..!!
ReplyDeleteहार्दिक आभार..रचना दीक्षित जी..!!
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद..दिगंबर नास्वा जी..!!
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद..हिमकर श्याम जी..!!
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