Tuesday, January 11, 2022

'आरज़ू..'





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"हम क्या सोचते हैं और क्या होता है.. मौसम के खेल में तराज़ू बिकता है..

लोगों का ईमान बदलते वक्त नहीं लगता..और इल्ज़ाम की तारीफ आपके कूचे पर डेरा जमा, मौज़ वाले छल्ले उछालती है..

इंसान करे भी तो क्या, जाए तो कहाँ.. हर उम्र छाले..हर राह पथरीली..हर किस्सा तंज़..हर एहसास फरेब..

रूह किसे अपना कहे..किसकी इबादत करे..किसके नाम पैगाम-ए-दिल भेजे..

तकदीर की तासीर भी अजब निकली, रंग के पैमाने फीके रहे..

चलता रहे कारोबार..खुशियाँ नज़ीर हों..सलामत रहे आरज़ू..और महकता रहे नज़रों का काफ़िला.. क्योंकि कोई शाम रुकती नहीं.. शब की बादशाहत भी चलती नहीं..

लबाबल रहे, मेरे होने का कलाम!"

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