Saturday, January 29, 2022

'तुम..'



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"आज ख़्यालों ने जी भर जीने का फैसला किया.. दिन भर की भागदौड़ ने अपनी भागीदारी समय की स्लेट पर गढ़नी चाही.. मोहब्बत के इश्तिहार भी खूब बाँटें.. पर आप जानते हैं, साहेब, वजूद के मौजूद दस्तावेजों ने हर दफ़ा एक ही अर्ज़ी लगाई - "आओ जो इस तरफ, तफसील से आना.. बैठो जो पास, अशआर साथ लाना.. तिलिस्म तुमसे माँगता मेरे सवालों के जवाब, तुम बेतकल्लुफ मेरा किरदार हो जाना"..

किसी का मरगज़ होने के लिए, खुद से बेगाना होना पड़ता है.. 

सच के शहर में सारे मकां बेरंग निकले..

तुम वो बटन हो, जिसे मखमली बक्से में सहेज मुसाफिरी करूँ तो तारीफ के सुर यहाँ तक गूँजेंगे..

तुम गुलाबी कागज़ वाला हस्तलिखित स्तंभ, मेरे होने का आधार!"

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1 comment:

  1. अर्ज़ी तो गज़ब की लगाई । यूँ शर्तें लगाना ठीक नहीं ।।
    कमाल के शब्दों में गुंथे हैं मन के भाव ।

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