Monday, January 22, 2018

'सिलवटें..'





...

"माँगा होता..
काश तुमने..
मोहब्बत का सफहा कोई..
भेज देता..
पोर का एहसास वहीं..
सिलवटें उलझतीं थीं..
छुअन को अपनी..

'जानां' जब आ गया..
जुबां पे तुम्हारे..
कहो..कैसे छोड़ दूँ..
ख़लिश सिरहाने..

वज़ूद चाहे 'नाम' अपना..
क्या इरादा इस 'शाम' सजना..!!"

...

6 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (24-01-2018) को "महके है दिन रैन" (चर्चा अंक-2858) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ARUN SATHI said...

सुंदरा रचना

Pratibha Verma said...

सुन्दर प्रस्तुति।

Priyanka Jain said...

सादर धन्यवाद, मयंक साब..

Priyanka Jain said...

सादर धन्यवाद, अरुण साथी जी..

Priyanka Jain said...

सादर धन्यवाद, प्रतिभा वर्मा जी..