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Saturday, January 18, 2025

ख़त बेनाम-से



ख़त - ४३

प्यारे साहेब,

आमद कुछ यूँ हुई गुलाबी जाड़े में लफ्ज़ों की.. के वक़्त की पेशानी पर उकेरे गए बेनाम-से नाम कई..

और उसने कहा, "सुनो, तुम लिखा करो। यूँ खुद से मिलने का एक रास्ता तो नक्की रहे!".. 

कितनी दफ़ा चलते हुए पा लेता है यह दिल मुक़ाम और कितनी रातें बेवज़ह ठहर जाता है मन का सामान.. उस रात चाँदी बिखरी थी हर ओर, चाँद वाली..पूरे शबाब पर था आसमां और सितारों की बज़्म.. कबसे जाना था उस राह, जहाँ सजा-धजा था शामियाना और मन की ख़्वाहिशें करीने से हर मसन्द पर टेक लगाए बैठीं थीं.. 

जैसे संगोष्ठी से आमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ हो,

"प्रिय सुधीजन,

'फरमाइशों के दौर में इक काविश अपनी भी हो..
पढ़िए कुछ ऐसा के इक तपिश सजी-सी हो..!!'

आपसे रूबरू होने को बेताब चमकते उपग्रह!!"

अन्तर्मन के तहखाने 'सुकूँ' की चाह में बीतते नहीं, उनमें दाखिल होता है सुर्ख़ स्याही से लिखा दस्तावेज.. और उगता जाता है घने पेड़ों से गहरा टापू.. 

मेरा रंगरेज़ कुछ अरसे से छुट्टी पर है, सो अनछुए रंग घट-बढ़ रहे.. इनका माप कभी गाढ़ा हो रोशनी से रत्ती भर जगाता, तो कभी मेढ़ पर ही मौलिक अधिकारों का विवरण करता..

प्यारे साहेब, जाने कौनसी यात्रा से मन तरंगित होगा, जाने कौनसा कमल अंतस में ऊष्मा का संचार करे.. 'समंदर' तो ख़ैर आपका अपना है, पर यह 'स्वप्निल समंदर' कहाँ भटका रहा.. आपसे वार्तालाप न हो पाने से मेरा 'आंतरिक समंदर' कम्पित हो उठता है.. प्रश्नों के बीज कहाँ-कहाँ छोड़ आती हूँ, रात्रि को मन के आलेख हिसाब माँगते हैं.. 

कभी तरल, कभी आत्मीय, कभी कठोरतम, कभी निष्ठुर..सब परीक्षा के संस्करण हैं, साहेब.. जीवन के औज़ार क़दम-क़दम सामर्थ्य-पान करते रहें, लौ और प्रेम दमकते रहें, पुष्पहार महकते रहें..

सुनहरी, नारंगी, हरी, पीली, मटमैली सूक्ष्म संवेदनाएँ पाएँ उपाधि और उपमाएँ..

स्नेह बरसता रहे, सदैव..

--#प्रियंकाभिलाषी


Monday, January 1, 2024

खत और आप..


Words Credit : प्यारे दोस्त को..
Photo Credit : अपना दूरभाष यंत्र..

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"प्यारे साहेब,

इन दिनों आपको पत्र लिखने का संयोग संभव न हो सका, मन ही दृढ़ नहीं होगा अन्यथा राही को डगर ज्ञात न हो, ऐसा होता है क्या?

आपका 'होना' जैसे प्रेरणा-पुंज, जब चाहें खोज लें परिस्थिति अनुसार 'पथ और पाठ'...

आपका 'अनुभव' जैसे मेरे लिए उपहार, जब चाहें मिलते 'उदाहरण हज़ार'..

आपका 'अपनत्व' जैसे प्रवाह, जब चाहें बहने दें भीतर के प्रमाद..

आपका 'स्नेह' जैसे मोतियों का हार, जब चाहें पहन सहेजें संबंध प्रगाढ़..

आपका 'उत्तर' जैसे नदी की धार, जब चाहें टटोलें स्वयं की झंकार..

आपकी 'सलाह' जैसे पुष्प हरसिंगार, जब चाहें मन सुवासित अपार.. 

शुक्रिया यूँ होने का!😍"

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--#खत 2024 का.. पहला-पहला.. ☺️

Sunday, August 7, 2022

'रास्ता..'



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"और मुझे लिखने थे किस्से..कभी दर्द के, फ़रेब के, इस्तेमाल किए जाने के, आउटसाइडर ट्रीट किए जाने के, डंप हुए जाने के और यह भी जतलाये जाने के कि "तुम हो ही कौन?? क्या वजूद?? क्या ठिकाना? क्या शौहरत??? क्या रुतबा??"...

पर कुछ तो है ज़िंदगी में, कुछ दोस्त ऐसे मिले, वक़्त की आंधियाँ भी अपना ज़ोर न दिखा सकीं.. 
वो दिलदार, जो शामो-सहर थामे रहे मशाल-ए-हौंसला..
वो बेहतरीन सौदागर, जो रोशनी की सुबह से राब्ता करवाते रहे.. वो मज़बूत दरख़्त, जो छाँव में अपनी सींचते रहे.. 
वो इंद्रधनुषी खजाने, जो मंज़र संवारते रहे..
वो चमकीले सितारे, जो अपनी नरम सेज पर सहलाते रहे..
वो अज़ीज़ मेहमां, जो मेरा ठौर हो गए..

तो भुला दूँ वो जो अपना था ही नहीं कभी..या सहज ही सिमट जाऊँ?? या बाँध दूँ कलाई पर वादे सारे या संग हो जाऊँ??

तुम ही कहो, ए-दोस्त.. किस शज़र जाऊँ..!!"

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--#बस यूँ ही..

Tuesday, January 11, 2022

'आरज़ू..'





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"हम क्या सोचते हैं और क्या होता है.. मौसम के खेल में तराज़ू बिकता है..

लोगों का ईमान बदलते वक्त नहीं लगता..और इल्ज़ाम की तारीफ आपके कूचे पर डेरा जमा, मौज़ वाले छल्ले उछालती है..

इंसान करे भी तो क्या, जाए तो कहाँ.. हर उम्र छाले..हर राह पथरीली..हर किस्सा तंज़..हर एहसास फरेब..

रूह किसे अपना कहे..किसकी इबादत करे..किसके नाम पैगाम-ए-दिल भेजे..

तकदीर की तासीर भी अजब निकली, रंग के पैमाने फीके रहे..

चलता रहे कारोबार..खुशियाँ नज़ीर हों..सलामत रहे आरज़ू..और महकता रहे नज़रों का काफ़िला.. क्योंकि कोई शाम रुकती नहीं.. शब की बादशाहत भी चलती नहीं..

लबाबल रहे, मेरे होने का कलाम!"

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Tuesday, August 3, 2021

'पाठ जीवन के..'

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"अब कोई साथ रहे ना रहे.. कोई आरज़ू नहीं, कोई फिक्र नहीं, कोई फर्क नहीं... आएँ, जाएँ, रुकें, बैठें ....उनकी मर्ज़ी..!!"

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--#कुछ पाठ जीवन के, यूँ भी सीखे जाते हैं..