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Monday, January 22, 2018

'सिलवटें..'





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"माँगा होता..
काश तुमने..
मोहब्बत का सफहा कोई..
भेज देता..
पोर का एहसास वहीं..
सिलवटें उलझतीं थीं..
छुअन को अपनी..

'जानां' जब आ गया..
जुबां पे तुम्हारे..
कहो..कैसे छोड़ दूँ..
ख़लिश सिरहाने..

वज़ूद चाहे 'नाम' अपना..
क्या इरादा इस 'शाम' सजना..!!"

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Sunday, December 31, 2017

'नये साल की एवज़ में..'



नया साल क्या लाएगा? आज जब मस्तिष्क ने पूछ ही लिया तो अब लिखना पड़ेगा..

#जां..

"मेरी रहगुज़र के सौदागर..
मेरी आहों के समंदर..
मेरे अलाव के शहंशाह..
मेरे एहसासों के कहकशां..
तेरी इक छुअन से पिघलता जिस्म..तेरी आहट से मचलता दिन.. तुम गहरे..बहुत गहरे जमे हो जिगर के गाँव..

फ़क़त इतना जान लो.. गर जाना चाहो तो चले जाना..मेरी मुहब्बत के मखमली सेज़ पर बिछी रहेगी ता-उम्र..तेरे पहले बोसे की निशानी..!!

आज़ादी मुबारक़, जां.. नये साल का नया हिसाब = वफ़ा + हरारत..;)

जब शामिल मुझमें हर शज़र..और महसूस होते इस कदर के रातें तुम बिन कटतीं ही नहीं..तो सुनते जाना - तू नहीं तो गुलाबी जाड़े की धूप आषाढ़ की तपती रेत..!!"

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--#किस्से मोहब्बत के रंग वाले..💝

Friday, October 6, 2017

'मुहब्बत के पैमाने..'




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"जिस्म पे तेरे..
निशां जितने..
मुहब्बत के..
पैमाने उतने..

लकीरों के खेल..
सजते जहाँ..
मुझे पाना..
एकदम वहाँ..

रवायत-ए-नज़्म..
चुका आते हैं..
चल आज फिर..
लफ्ज़ गहराते हैं..

मतला-रदीफ़..
कौन जाने..
तेरी आगोश..
इक मुझे पुकारे..

दरमियां ख़लिश..
इक मौज़ूद..
ख़ुमारी बेपनाह..
मेरे महबूब..

आवारगी के..
डेरे में..
हम-तुम..
उस घेरे में..!!"

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--दास्तान-ए-मोहब्बत..




Monday, September 26, 2016

'दहलीज़-ए-रूह..'








#जां

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"आज दिल मचल गया..
कुछ ऐसे..
थाम लो..
अपने आँचल जैसे..

बंधा रहूँ..
वक़्त-बेवक़्त..
कलाई पे..
तेरी घड़ी जैसे..

लटकता रहूँ..
साँस-दर-साँस..
दहलीज़-ए-रूह..
तेरी चेन जैसे..

कस लो गिरफ़्त..
दम निकले..
रेज़ा-रेज़ा..
तेरी आह जैसे..!!"

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--दिल धड़कने का सबब याद आया..

Monday, November 30, 2015

'कशिश..'




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"मेरे हर उस खालीपन को..भर जाते थे तुम..
उँगलियों से अपनी..किस्सा गढ़ जाते थे तुम..
दरमियाँ होतीं थी..अनकही बातें..औ' कशिश..
चहकता था..कुछ यूँ..रूह का इक-इक पुर्ज़ा..
गर्माहट से अपनी..साँसें निहार जाते थे तुम..!!!"

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'मोहब्बत के फ़साने..'




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"इस गुलाबी सर्दी में..
तरसती उंगलियाँ..
तेरी छुअन..

आ किसी रोज़..
लफ़्ज़ों में ही लिपट कर आ..

बंदिशे यूँ भी..दरमियाँ..
ठहर सकतीं नहीं..!!"

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--एहसास प्यार वाले..

Friday, June 19, 2015

'गले..'





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"हम कैसे करें भरोसा..
कभी गले मिलें तो जानें..

साँसों से पूछेंगे..
शराफ़त का मीटर..
कितना है चलता..

सिर्फ़ राईट-लैफ्ट..
या..
दम भी है घुटता..!!"

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--थोड़ी-सी शैतानी.. ;)

Monday, April 6, 2015

'खंज़र उठाओ..'

#जां



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"तुम क़त्ल लिखती हो..
तुम नज़्म लिखती हो..
जाने कैसे..
तिलिस्म गढ़ती हो..

तुम आह भरती हो..
तुम चाह भरती हो..
जाने कैसे..
साँस पढ़ती हो..

तुम दर्द चखती हो..
तुम रूह चखती हो..
जाने कैसे..
वीरानी चढ़ती हो..

लबरेज़ हूँ..
खंज़र उठाओ..
ख़ानाबदोश हूँ..
गिरफ़्त बढ़ाओ..!!"

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--जां..मेरी जां..<3

Sunday, November 23, 2014

'गुलाबी सर्दी..'






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"नर्म गुलाबी सर्दी को..
जिंदा कर दो..
‪#‎जां‬ मुझे फिर..
गिरफ़्तार कर लो..!!"

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--जाड़े की महक..

Friday, October 10, 2014

'प्रेम-पत्र..'






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"मिट गया फिर से..
प्रेम-पत्र तेरे नाम का..
लिखा था जो लेट-नाइट्स..
जीमेल हिंदी वाले पेज पर..

इन्सटौलमेंट्स में छपते गए..
तुम्हारा प्यार बाँधे 'हर्फ़'..
इंस्टैंट सेव भी होते थे..
ये ज़ालिम मैटर रफ़..

हाय रब्बा..
सुना आपने..
प्यार भी इलेक्ट्रॉनिक हो गया..!!"

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--शुक्र वाला शुक्रिया.. <3

Friday, September 26, 2014

'लॉन्ग लव लैटर्ज़..'




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"सुनो जां..तुम्हें उस अज़ीम मुहब्बत का वास्ता.. उस मुकद्दस मुक़ाम की कसम.. उन सलाख़ों की ज़ंजीर की तड़प देखो.. चाँद-सितारों का दामन पिघलने लगा है..


अब भेज भी दो न..मेरे वो लॉन्ग लव लैटर्ज़..!;-)!"

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--शुक्र का शुक्रिया..<3

Monday, September 22, 2014

'हर्फ़..'





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"तेरी इक छुअन से..
खिल उठी..
उंगलियाँ मेरी..

बरबस..
हर्फ़ महकने लगे हैं..!!"

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Wednesday, August 13, 2014

'लेफ़्ट-हैंड डे..'




#जां

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"सुना..आज लेफ़्ट-हैंड डे है.. मैं तो यूँ भी आपके LHS पर ही रहती हूँ.. ;-) मतलब...आज मेरा डे है..स्पेशल वाला..!!"

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--शब के इंतज़ार में..

Sunday, July 20, 2014

'धूप..'




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"मेरे हिस्से की धूप..तेरे नाम लिख दी..!! साँसों में तैरती ख़ुशबू..जां के नाम लिख दी..!!"

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--यूँ ही बेवज़ह..

Thursday, June 26, 2014

'प्यार..'






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"प्यार..
लफ्ज़ ख़ूबसूरत है..

बहता..बढ़ता..
दर्द की चट्टानों से लड़ता-झगड़ता..
इक तेरी छुअन को तरसता..
पग-पग महकता..
दरिया-सा बहकता..
चाशनी की तार-सा पकता..
विरह की रात में सुलगता..
उल्फ़त को ओढ़ता..
देह को रूह से जोड़ता..

मुझे तुम्हारी गिरफ़्त में बाँधता..
पोर की गर्माहट मापता..
धड़कनों को जाँचता..

और..
और..

तुम कहते हो..
मैं नहीं जानता..
११६ चाँद की रातें..!!!"

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--वीकेंड का ख़ुमार..चढ़ रहा..

Saturday, May 17, 2014

'मुस्कराहट..'







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"मेरी मुस्कराहट के आखिरी पड़ाव.. हाँ जी..आपकी आँखों को ही संबोधित किया जा रहा है..यहाँ..!!"

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--मस्ती-टाइम..

Tuesday, January 21, 2014

'अलाव की शाम..'




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"उम्मीद का दामन थाम निहारता रहा..तनहा था हर छोर, जाने क्यूँ हाँफता रहा.. मेरा माज़ी..अब तलक पेशानी पे बोसे जड़..मेरी खुरदुरी लकीरों को सहलाता है..!!

तलाश में हूँ..उस सहर की जो शुरू हो तेरे अलाव की शाम से..!!"

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'साँसों में खलिश..'




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"इक सच मेरा तुझसे रहेगा जुड़ा जब तक है साँसों में खलिश.. तुम चाहो न चाहो..!!"

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Thursday, November 28, 2013

'ओढ़ लें..'













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"मेरी जां..

तुमसे ही सुबह होती है..
तुमसे ही शाम..

जिस दिन सोचूँ..न करूँ परेशां..
उस दिन ही होते हो..
तुम सबसे ज्यादा परेशां..

ऐसा क्या है हम दोनों के बीच..
लेता है रंग जो स्याह अंधेरों के बीच..

पहर सारे रात-भर रोशनी मंगातें हैं..
हमसे गरमी के सारे अलाव जलाते हैं..

सूत की चादर और सिलवटों के लिहाफ़..
सजाते हैं हमसे..उल्फ़त के खिताब..

पोर से रिसते बेशुमार टापू..
सीखा हमसे है होना बेकाबू..

आज़ादी का जश्न तेरी बाँहों में..
गिरफ़्त का सुकून तेरी आहों में..

राज़ तेरे-मेरे..दांव पे ज़िन्दगी..
आ ओढ़ लें..रूह की दीवानगी..!!"

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--कुछ ख़त जो भेज न पाए उन्हें..

Friday, November 22, 2013

'लकीरों की चाहत..'










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"तुम मेरी ज़िन्दगी का नहीं..मेरा एक अटूट हिस्सा बन चुके हो.. हर नफ्ज़ मुझमें शामिल रहते हो..कहीं भी जाऊँ, साँसें महकाते हो..कितने ही गहरे हों स्याह रात के साये, अपनी बाँहों में छुपा दर्द पिघला देते हो..!!!

आओ, उड़ जाते हैं भुला दुनिया..रवायत.. महसूस करते हैं लकीरों की चाहत..!!"

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