*ख़त १२२*
साहेब,
प्यारे साहेब,
मेरे साहेब,
मेरे प्यारे साहेब...
मेरे हर मुश्किल क्षण में आशा की किरण दिखलाते, मेरे लाइटहाउस..
स्वप्नों को पकने के लिए उर्वरक मिट्टी चाहिए तो धूप भी निभाती है अपने होने का फर्ज़.. परिश्रम के साथ हौंसला कंधे से कँधा मिलाकर चले तो स्वप्निल सितारे पूरे उत्साह से चमचमाते हैं..
रिश्ते भी कुछ यूँ ही होते हैं न, साहेब.. जवाब चाहते हैं और पा लेने पर लौ भी ख़ुमारी लबरेज़ हो उठती है..
तन्मयता, आश्वासन, पूर्ण विवेक से रची-बसी जाती है, अपनों पर वार करने वाले शब्दों की धार.. आसां कहाँ है, साहेब, प्रेम बरसाना..उपमाएं पढ़ना..कलावा बाँधना..सहर्ष आलिंगन देना, अंतस की गहराईयों से..
बेहिसाब मुलाकातें..बेफ़िक्र मुस्कुराहटें..बेनिशाँ सिलसिले..
उस इत्र की महकास जैसे आकाश की छाँव बन बरसतीं रहें क्षण-क्षण और रेज़ा-रेज़ा खुशबू से चहकता तुम्हारे होने का एहसास..
पोरों पर ठहरता उस अनुपस्थिति का 'राग'..
कैसे गढ़े जाते हैं, आत्मीयता के औज़ारों से घनिष्ठता के झरोखे..
कैसे पिरोई जातीं हैं, अपनत्व की माला..
कैसे सही अनुपात में निकाली जाती है, जड़ से औषधि की उपयुक्त मात्रा..
कैसे मुलायम कोमल तरंगों से खिल उठता है, अंतर्मन का कवि..
कैसे बहती है उन बेशकीमती संकेतों की कश्ती, संप्रेषण की कार्यप्रणाली में..
आम्र-मंजरी का सुखद अनुभव निबोरी-सा स्वाद दे जाता है..कभी उस बोल से, कभी उस वातावरण से.. संबंधों के वशीभूत सह जाते हैं मन की प्रीतियाँ.. और अंततः चेतनाशून्य बन उग आते हैं स्याह गोले..
संबंधों के लेखे-जोखे अपना अस्तित्व सहेजते, काश..
काश, लौट आते गुलाब जल के छींटे इस तपिश भरी गर्मी में..
काश, गुलमोहर के सुर्ख रंग बनते एक दूसरे को पोषित करने के गवाह..
काश, उजास से निकलतीं अनगिनत शहनाईयाँ.. 🪈
काश, हृदय-द्वार पर रोपतीं मेरे होने का प्रमाण..
एहसासों की आकाशगंगा में मोहब्बत की रोशनी अनवरत चले..✨
जब-जब गुंज़ाइश हो, अनुराग की रफ़ू से रूह सफ़र पर रहे..💫
साहेब, आपका अनायास मेरे जीवन में आना, लफ़्ज़ों के घरौंदे बनवाना, उपमाओं की झालर लगवाना, हौंसला भरते जाना, 'नेमत' बन सँवारना.. मुझे 'मुझसे' मिलवाने की रुपरेखा होगी, शायद..
बेहद शुक्रिया, यूँ मेरे साहेब होने का..❣️
स्नेह बरसता रहे, सदैव..❤️
-- #प्रियंकाभिलाषी..

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