Sunday, April 4, 2010

'खामाखां..'


...

"भिगो गयी..
रुसवाई की आँधी..
साँसें उलझी हैं..
रूह से..
खामाखां..!!"

...

16 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

sangeeta swarup said...

अक्सर होता है कि
आंधी में
पत्ते और बेलें
उलझ जाती हैं.
कुछ यहाँ भी
हुआ है ऐसा ही
खामखां


बाहर खूबसूरत लिखा है आपने

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद संगीता जी..!!

M VERMA said...

सुन्दर पंक्तियाँ
बेहतरीन

देवेश प्रताप said...

ये आपकी खासियत है ......कम शब्दों में भी बहुत कुछ कह देती है ......बहुत सुन्दर रचना

Shekhar kumawat said...

PHOTO SE SAB KUCH SAMJH AA GAYA AAP KE DIL KA HAL

SHEKHAR KUMAWAT

http://kavyawani.blogspot.com/

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद देवेश प्रताप जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धनयवाद वर्मा जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद शेखर कुमावत जी..!!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!

विजयप्रकाश said...

वाह...बिल्कुल नपी-तुली बात, सुंदर कविता

JHAROKHA said...

in thode shabdo me bahut hi gahari baat kah di hai aapne.bahut khoob,.

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद विजयप्रकाश जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद झरोखा जी..!!

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

nice one