"इक तेरा चित्र खिला जबसे..
मन की बगिया में..
उभर आये लाल, गुलाबी, पीले, नारंगी पुष्प कितने..
बिखेरती है सूरज की आभा..
जब अपना स्वर्णिम..
लरजती है..
ओस की बूँद तभी..
चलो,
बहुत हुआ..
यूँ ना नश्वर को और नश्वर बनाओ..
समीप आ..
पुष्प अर्पण कर
प्रभुवर शीश नवाओ..!!"
"चलने का प्रयोजन..
न पता था..
जिस क्षण दिया..
हाथ में हाथ..
किंचित ही भ्रम था..
अर्पित कर स्वयं..
मुक्ति-द्वार की अभिलाषा..
अवतरित हो हे-ईश..
बुझाओ तुच्छ-पिपासा..!!"