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Sunday, March 29, 2026

ठिकाने..



*ख़त १२३*

प्यारे साहेब,

किस्सों ने जितना आराम दिया इस दिल को.. कोई और होता तो कबका रस्ता बदल लेता.. कुछ साथ जीवन भर के लिए होते हैं, फिर कोई भी मौसम हो या कोई भी साज़.. 

बेख़बर रहना भी कभी-कभी सुकूं  से भर देता है दिल की वादियाँ.. ख़ुमारी की बारिशें और बेफ़िक्री के कनात, कुछ खुशियाँ दिल से उगकर आँखों में अपना डेरा जमातीं हैं..

मुझे इश्क़ है उन बेशकीमती तोहफ़ों से, यारियों के चौक से निकल आसमां के सितारों तक अपनी सतरंगी झालर लगाते हैं.. और हम चहकते-महकते ख़ुद का 'मैं' पा जाते हैं..  

मुझे अथाह प्रेम है उन निर्मल कोशिकाओं से, जिनमें अनवरत बहतीं हैं सीधी-सच्ची-अधपकी-नरम भावनाओं की विराट नाव..

मुझे बेइंतहा मोहब्बत है उन मजबूत पोरों से, जिनकी खुशबू से दमक उठतीं हैं आज़ादियाँ..

अर्ज़ियों के दौर में मेरा ठिकाना तुम ही रहे.. आलिंगन की बैठक में, मेरे प्रिय यथार्थ तुम ही रहे.. उत्सवों की भागदौड़ में, मेरे गुलमोहर तुम ही रहे..

यूँ ही बरबस लिखता रहे, रूह का हथकढ़ तेरा नाम.. के तुमसे ही मुमकिन दोस्ती की पहचान..

स्नेह बरसता रहे, सदैव..❣️

--#प्रियंकाभिलाषी

Thursday, April 20, 2023

'तरबतर खत..'

साहेब, ओ प्यारे साहेब,

आज आपको हाले-दिल न लिख पाती तो मलाल होता.. खुशबू से तरबतर रूह और एहसासों से लबालब साँसें.. काश, लफ्ज़ आज्ञाकारी मित्र की तरह बात मानते और पढ़ते जाते मेरी खामोश गुफ्तगू!

सुनते वो खनक हँसी की, पिरोते खुशी की माला, सहेजते पोरों से महकते खत, थपथपाते नेह के बाँध.. ऐसा मंज़र जुगनुओं ने दरख़्त के आसपास संजो रखा है, चलिए किसी रोज़ साथ देख आएँ..😍

अनगिनत बिंब और अनकही उपमाएँ, मेरे अंतस के महाद्वीप पर उग आए हैं.. ऐसी लज़्ज़त, ऐसी खुमारी और कहाँ अता होगी, आप ही कहिए, साहेब..

रंगों की पिचकारियाँ और रंगरेज के डिब्बों में लयबद्ध खड़े कच्चे-पक्के मिज़ाज़, अपने मांडणे में इन्हें साथ ले लीजिए, साहेब.. उसकी शदीद मोहब्बत में,  महबूब के बेसबब इंतज़ार में, ट्यूलिप के गुलिस्तां में, धड़ल्ले से भागता मेरे नाम का छल्ला..

खुशफहमी के पाल और इनायत के पाये, इस दफा खूब सज संवर कर आए हैं.. खतों के सिलसिले खातों में जोड़ें जाएं, ये नाम-जमा वाली वसीहत ज्येष्ठ के महीने में ठंडी बयार ले आए.. और हाँ, इस रूमानी एडिक्शन की ज़मानत न होने पाए कभी!!

इस अवचेतन मन में सुकूँ के बीज रोप पोषित करने वाले प्यारे दोस्त का शुक्रिया..

--#प्रियंकाभिलाषी

Saturday, April 16, 2022

'प्रेम का पर्याय'..




एक खत, आपके नाम..

...

"एक दोस्त है, खिला-खिला..सुलझा-सुलझा.. अनुभव से लबालब.. 

वक़्त-बेवक़्त जब भी दरवाजे पर दस्तक दूँ, सवालों का पिटारा खोलूँ, उलझनों का ज़िक्र करूँ या यूँ ही आते-जाते आवाज़ दूँ.. उस फूलों के सौदागर का स्नेह भरा पैग़ाम आता ही है..

एक आधारस्तंभ सबकी चाह होती है, फिर चाहे वो रत्न जड़ित हों, शुद्ध स्वर्ण के, या रजत का माप ओढ़े.. अमूल्य अनमोल उत्कृष्ट धरोहर की श्रेणी में आपका स्थान आरक्षित है..

कितना महफूज़ है, उसके दोस्तों का दर्पण.. वो किस्मत वाले..वो हमजलीस..वो हमदम..वो यार..वो दिलदार.. वो खुशनसीब.. सब आपके होने से सुकूँ के छल्ले उड़ाते हैं.. आपके दम से बेहिसाब जंग लड़ने के बाद भी दोगुना हिम्मत से फिर उठ जाते हैं..

यकीं न आए तो देख लीजिए, उनकी आँखों की चमक, चेहरे की रंगत, आवाज़ का जादू.. यह सब आपकी उपस्थिति का साक्षात उदाहरण है.. 

मुश्किलों की शिकन पेशानी पर उभरने नहीं देता.. मन की सिलवटों को करीने से हर सुबह जमाता.. स्वयं के अस्तित्व से मिसाल पेश करता कि जो हो जाए, निर्बाध चलते रहो, तटस्थ रहो.. 

मुझे ऐसे प्यारे दोस्त से प्यार है.. हाँ, अथाह सागर की तरह जितना गहराता जाता हूँ, तुम पल-पल मुझे उभारते जाते हो.. हर दफ़ा नया अध्याय, नया रहस्य, नई ऊर्जा, नई सोच.. तुमसे ही पाता हूँ..

कैसा तिलिस्म है, तुम्हारे साथ का.. किस्सों के हर दौर में ज़िक्र तुम्हारा शामिल रहता है..

तुम मेरे लाइटहाउस हो! (अब यह थोड़ा पुराना हो गया, शायद.. पर यकीं जानिए, मार्गदर्शन के शहर में उम्दा नक्काशी वाले मील के पत्थर हैं, आप!)..

बेहद शुक्रिया प्रिय दोस्त, इस शुष्क मन को सींचने का.. मित्रता के पुष्प महकाने का.. लक्ष्य भेदने के उद्बोधन का.. शुक्रिया, आपके होने का!!"

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Saturday, January 29, 2022

'तुम..'



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"आज ख़्यालों ने जी भर जीने का फैसला किया.. दिन भर की भागदौड़ ने अपनी भागीदारी समय की स्लेट पर गढ़नी चाही.. मोहब्बत के इश्तिहार भी खूब बाँटें.. पर आप जानते हैं, साहेब, वजूद के मौजूद दस्तावेजों ने हर दफ़ा एक ही अर्ज़ी लगाई - "आओ जो इस तरफ, तफसील से आना.. बैठो जो पास, अशआर साथ लाना.. तिलिस्म तुमसे माँगता मेरे सवालों के जवाब, तुम बेतकल्लुफ मेरा किरदार हो जाना"..

किसी का मरगज़ होने के लिए, खुद से बेगाना होना पड़ता है.. 

सच के शहर में सारे मकां बेरंग निकले..

तुम वो बटन हो, जिसे मखमली बक्से में सहेज मुसाफिरी करूँ तो तारीफ के सुर यहाँ तक गूँजेंगे..

तुम गुलाबी कागज़ वाला हस्तलिखित स्तंभ, मेरे होने का आधार!"

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Thursday, June 17, 2021

इश्क़






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"मुझे इस बेवज़ह की बेतरतीबी से इश्क़ है..!!"

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Tuesday, June 15, 2021

'प्यार से सागर या सागर से प्यार'..




***

प्यार में सागर था या सागर से प्यार.. उत्तर कठिन है परंतु दिशा..दशा..सही? 

क्या यह सच है इंसान प्यार में बंध कर उलझ जाता है.. प्रेम के बंधन आपसे आज़ादी छीन लेते हैं.. आप वो सब कुछ नहीं कर पाते, जिस खास विशेषता के लिए आपको उस 'विशेष' ने चुना था.. 

सवाल थोड़े सच में डूबे हैं, थोड़े वक़्त के थपेड़े से चटके हुए.. आप सब जानते हैं ना साहेब, तो बताइए क्यों ऐसा होता है.. जो संगीत इन साँसों ने लयबद्ध किया था कभी, आज शोर क्यों करार दे दिया जाता है..

शौर्यगाथा पर्वत की गाएँ कि अडिग था, मज़बूत था, नदी को बहने दिया, सो दरियादिल भी कहें.. या नदी के समर्पण, नम्र व्यवहार को सम्मानित करें.. खेल के नियम कहते हैं कि सबको बराबर समय और मौका आवंटित किया जाएगा, तो इश्क़ की भाप में मन से पर्दे क्यों उतर जाते हैं..

सुरूर सरोवर से उठा और कमल में अवतरित हुआ.. और उनका संयोग समानता न झेल सका..

सर्जनात्मक पहल करने को आतुर मन और संपादकीय संपदा विशालकाय हुई तो उसकी ताकत कौन था? 

प्रश्न हल हो ना हों.. नये पहलू तराशते रहने चाहिए, कोई भी आयाम बिना खोज नहीं मिलता.. 

रूह तक पहुँचता प्रेम है तो जो जिस्म की चाह से शुरू हुआ और कुछ वक़्त इसके इर्दगिर्द रहा, वो क्या था.. संग्रहित भावनाएँ कभी झलकतीं हैं तो कभी छलकतीं.. मन कशमकश में होते हुए, वो सब कर जाता है जो शायद अस्वाभाविक होने के साथ-साथ अवांछनीय भी था..

उलझन बहुत है और रास्ता.. जाने क्यों आपसे ये सब कह रही, पूछ रही.. मेरी प्यास, तलाश, लौ, सरहद..अजब पहरेदार हैं मेरे सीने के, अरसे से बुझी नहीं जैसे ये आग..

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--#किस्से_और_मैं - १