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Wednesday, July 26, 2017

'रजनीगंधा ..'







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"रजनीगंधा का फूल..
अब तक महकता है..
उस उर्दू-हिंदी डिक्शनरी में..

हर बार उठाती हूँ..
शेल्फ से जब..
उंगलियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद..
महसूस कर लेतीं हैं..
रूह तुम्हारी..

सफ़ेद पंखुरियाँ अब सफ़ेद कहाँ..
तेरी सौंधी खश्बू..
रेशे-रेशे में उतर आई है..

छप गयी है उस पन्ने पे..
तस्वीर तेरी..
पोर से बह चली हरारत कोई..

तेरी गिरफ़्त के जाम..
सुलगा रहे..'कैफ़ियत के दाम'..

लिखना-पढ़ना काफ़ूर हुआ..
मिलन जब उनसे यूँ हुआ..

हर्फ़ भुला रहे..राग़ सारे..
लुटा रहे..'हमारे दाग़' सारे..

शिराओं के ज़ख्म उभरने लगे..
तेरी छुअन को तरसने लगे..

हरी कहाँ अब..रजनीगंधा की डाली..
बेबसी दिखा रही..अदा निराली..

चले आओ..जां..
कागज़ को छू..
मुझे ज़िंदा कर दो..
भर दो..
महकती साँसें..
चहकती आहें..
पोर का सुकूं..
और..
इसकी सिलवटों में..
सिलवटें हमारी..!!"

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--तुमको भी बहुत पसंद है न..रजनीगंधा की सौंधी सुगंध..

Thursday, October 22, 2015

'लकीरें..'




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"कश्ती के सैलाब थे..
या..
मोहब्बत के ज़ख्म..

फ़क़त..
रंगों की तहज़ीब..
औ'..
लकीरें बह गयीं..!!"

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Sunday, June 22, 2014

'फ्री-किक शॉट..'








#जां

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"तलाशती है..
मेरे हिस्से की धूप.. आँचल तेरा..
मेरे वज़ूद की सहर..ख़ुशबू तेरी..
मेरे जिस्म की मिट्टी..पोर तेरे..

सुना है..
तुम्हें फुटबॉल का..फ्री-किक शॉट सबसे ज्यादा लुभाता है..
जो बारहां..लेट नाईट ही आता है..

इन दिनों..
मैं..सुलग रहा हूँ..
एसी की ठंडी हवा वाली..
लम्बी रातों में..

वक़्त का अपना मूड है.. तो..वक़त भी..

वैसे..
आज किसका-किसका मैच है..??"

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Wednesday, October 16, 2013

'प्रेम के अर्थ..'






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"क्या प्रेम में मिलना ही सब कुछ है..?? इसकी अनुभूति स्वयं में इतनी प्रबल है कि किसी और व्यक्ति या वस्तु विशेष का कोई स्थान शेष ही नहीं रहता..कोई रिक्तता का प्रश्न ही नहीं..!!! जाने क्यूँ..कुछ जन इस 'प्रेम' के इतने अर्थ कहाँ से ले आते हैं..??

वैसे भी, जीवन में पाना ही सब कुछ नहीं होता.. भोजन के स्वाद का सही माप तो दूसरे को चखा कर ही ज्ञात होता है.. है ना..??"

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--सिली पीपल..

Sunday, October 6, 2013

'कभी..'








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"खलती है कमी इक तेरी..
रूह पूछती है सवाल कई..
किसका जवाब दूँ..
किससे राह पूछूँ..
कौन आयेगा यहाँ कभी..

मर्ज़ी इक तेरी..
दहशतगर्दी इक मेरी..
साँस की डोरी..
कच्ची रही..
यूँ ही..
क्या समझेगा कोई कभी..!!"

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Sunday, July 21, 2013

'सुंदर ख़्वाब..'



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"क्यूँ इतनी हिम्मत नहीं रखते कि मुझसे ही कह सको..मैं तुम्हारे लिये नहीं..!!! रेज़ा-रेज़ा कहर ढाते हो, क़यामत का इम्तिहान लेना बंद करो..वरना, जल्द ही साँसें चुप हो जायेंगी..!!"

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--कभी-कभी यूँ भी लिखे जाते हैं शब्दों के सुंदर ख़्वाब..

Tuesday, May 28, 2013

'ख़ता..'




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"ऐसी ख़ता हर शाम मेरे साथ हुई..
कतरी ख़ुशी फ़क़त मेरे नाम हुई..!!"

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Wednesday, April 3, 2013

'जिद्दी यादें..'



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"बंद करूँ खिड़कियाँ कितनी..
खींच डालूँ दरवाजे बेशुमार..

जिद्दी यादें..जातीं ही नहीं..!!"


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Wednesday, February 27, 2013

'मिलन की रात..'




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"ना जाने कब से तड़प रही थी..तेरी आवाज़ सुनने को.. अटके हर्फ़..तंग साँसें..उँगलियाँ जम गयीं हों जैसे..सब कुछ बर्बाद..बिन तेरे--कुछ नहीं कामिल..!!!!

तलाशो ऐसा दरबार, जहाँ फैसला हो..दूरियां मिट गुल खिलें..हक़ में आये मिलन की रात..!!"

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--बातें बेवज़ह..

Sunday, January 6, 2013

'रेला..'






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"कोई रख सकता जन्नत आँखों में..
कोई लपेट देता लिहाफ़ लज्ज़त के..
कोई जला देता साँसों की सिगड़ी..
कोई बिछा देता आहों की लकड़ी..

सुलगती रहती रेज़ा-रेज़ा..
गहराती जाती वफ़ा तह-दर-तह..

काश..
माज़ी लकीरों का सौदा ना करता..
हसरतों का बाकी कोई रेला ना होता..!!"

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Sunday, December 30, 2012

'दश्त..'





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"नुमाईश करते नहीं फ़न की..ए-वाईज़..
सुना है..बिकता वज़ूद हर दश्त यहाँ..!!"


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Tuesday, July 17, 2012

'बदनाम..'


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"मेरी इबादत का इंतज़ाम हुआ..
हर नफ्ज़..आज फिर बदनाम हुआ..!!"


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Monday, July 9, 2012

'बेचैन रवानी..'




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"मायने बदले..
मियाद कम हुईं..
बेचारा दिल..
सह ना सका..
दीवारों में क़ैद रूह की..
बेचैन रवानी..!!"

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Saturday, July 7, 2012

'सूक्ष्म संकीर्ण..'




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"पश्चाताप गहराता जा रहा..
क्यूँ बंधन स्वीकार किया..
काश..
न झुका होता..
समाज की सूक्ष्म संकीर्ण दीवारों के आगे..!!"

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Wednesday, May 2, 2012

'महफ़िल..'




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"कभी मदमस्त राहें चूमा करती थीं..
खामोशी के काफिले..
आज तनहा हो चले..
महफ़िल के साहिल..!!"


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Wednesday, April 25, 2012

'खैरियत..'



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"खामोश रहूँ..
खैरियत रूह की..
मुमकिन हो फ़क़त..!!"

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Monday, April 2, 2012

'माज़ी..'

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"रेज़ा-रेज़ा महकता..
कतरा-कतरा समेटता..
माज़ी..
काश..!!"


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Saturday, March 31, 2012

'आँसू की चादर..'

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"लिपटे रहे..
आँसू की चादर..
अश्कों के लिहाफ.
अक्सर..
बेरंग होते हैं..!!"

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Friday, March 9, 2012

'अल्फ़ाज़..'

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"अल्फ़ाज़ बहुत भारी थे..
तेरी आँखों के..
समंदर भी कम रहा..
समेटने की चाहत में..!!"



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Sunday, January 15, 2012

'वजूद..'





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"कुछ ख्याल..
कुछ रंग..
बदलते हैं वजूद..
कुछ रिश्तों के..
कुछ अश्कों के..
रंग नहीं होते..!!"

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