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Tuesday, October 27, 2020

'लफ्ज़ों की कैफ़ियत..'



Credit : कुछ रूमानी रूह जो बरबस आपको आपसे मिलवाने आतीं हैं..

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"समंदर की आग कौन जानता है.. पानी का दर्द कौन समझता है.. आग की प्यास कौन महसूसता है.. फिज़ा की अगन कौन सहलाता है..

कुछ दर्द हमें जितना उधेड़ते हैं, उतने दराज़ भरते जाते हैं..लफ्ज़ों की कैफ़ियत से..!!"

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Sunday, December 31, 2017

'मियाद आसमां की..'


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"मोहब्बत की ख़ुशबू
या देह की सुगंध..
आलिंगन यार का..
या गिरफ़्त महबूब की..

जानते हो न..
बेइंतिहां चाहती हूँ तुम्हें..

कुछ सफ़हे ज़िंदाबाद रहते हैं..
औ' कुछ ज़िंदादिली की मिसाल..
मियाद आसमां की भी रही होगी..
बेसबब टंगे होते रेज़ा-रेज़ा सितारे..!!"

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--#दर्द कैसे-कैसे..

Wednesday, March 30, 2016

'सितारों के दामन..'





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"दफ़न होने को बेक़रार बैठी हूँ..
मय्यत पे अपनी..बेज़ार बैठी हूँ..

चाहा था..बेहिसाब बेख़ौफ़..तुझे..
साया-ए-उम्मीद..हार बैठी हूँ..

फ़िक्र न करना..ए-हमजलीस..
गिलाफ़-ए-रूह..मार बैठी हूँ..

करो रुकसत..ख्वाहिश-ए-सुकून..
सितारों के दामन..उतार बैठी हूँ..!!"

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--प्रिय मित्र की विदाई पे..उठते भाव कई.. वो कह गए, हम लिखते अच्छा हैं..

Friday, March 25, 2016

'चाहत के जुर्माने..'






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"रूह पे चला दे..
तेरे कॉम्पस का..
पॉइंटेड पॉइंट..

खेंच मनमर्ज़ी से..
छोटे-बड़े..
बेहिसाब सर्कल्स..

सहने दे ज़ख्म..
हल्के-गहरे..
सुबहो-शाम..

लिखे थे जो..
वस्ल-ए-रात..
मेरे नाम..!!"

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--चाहत के जुर्माने..

Monday, February 29, 2016

'दौड़-ए-ज़िन्दगी..'


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"वक़्त की आँधी थी..
औ' मैं अकेला..
चलने को मजबूर..
कदमों का रेला..

उठा दिल..
सहलायी रूह..
समेट अपने..
एहसासों का ठेला..

मुमकिन कहाँ..
मसरूफ़ियत यहाँ..
फ़ैला हर दश्त..
अरमानों का मेला..

बिछड़ गए..
यार मेरे..
दौड़-ए-ज़िन्दगी..
पेंच ख़ूब खेला..!!"

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Friday, January 29, 2016

'टुकड़े नींद के..'





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"वक़्त संभाले मुझे..
निभाए रवायतें..
खंगालती रही..
बेहिसाब-से हिसाब..

टूट जायें..
रूह के सारे ख्व़ाब..
टुकड़े नींद के..
जिस्म चीरते रतजगे..
औ' लफ़्ज़ों की गाँठ..

कीमत कौन जाने..
आवारा साँसों की..
दर्ज़ हर दरख्त पे..
गुनाह-ए-हसरत..

मैं बिकता..
अंजुमन-अंजुमन..!!"

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Monday, November 30, 2015

'लफ़्ज़ों की टोली..'






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"इश्क़ करना..
'मेरी ख़ता'..

अबसे न होगी..
लफ़्ज़ों की टोली..

तेरी ज़िन्दगी में..
मेरी आँख-मिचौली..

याद न करना..
मुझे कभी..!!"

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--सबब-ए-मोहब्बत..

Friday, August 7, 2015

'मन की पाबंदियाँ..'








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"आज..
मन की अपनी पाबंदियाँ हैं..
रूह की अपनी तड़प..
देह की अपनी धरा..
और..
दोस्ती की अपनी ज़रूरत..

मैं अब भी वहाँ हूँ..
बहती थीं..
प्रगाढ़ता की नदियाँ जहाँ..

समय के वेग ने..
भेजा होगा..
दिशा बदलने का नारा..

चप्पू ने भी तुरंत किया होगा..
सहमति का इशारा..

ज़िंदगी की मार से..
कविता लिखने लगी हूँ..

बारिश में तलाशने लगी हूँ..
मोती और पन्ने..!!"

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--मोह का मरहम..जुदाई की रात..

Friday, July 31, 2015

'रुकसत की शहनाई..'




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"कहाँ लिख पाता हूँ..
हाले-दिल अब..
गहराने लगे हो..
साँसों में जब..

ख़ास हो गए तुम..
दुनिया की तलब..
मैं कहाँ कह सकूँगा..
मोहब्बत के शफ़क़..

गिरफ़्त कस..रूह..
बंधे जाने..कब..
बोसे का जादू..
महके किस शब..

फ़साने दरमियान..
धड़कन-ए-दिल सबब..
हारा हर बाज़ी..
हसरतें गयीं दब..!!"

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--ग़मे-जुदाई..रुकसत की शहनाई..फ़ुरक़त के शज़र..

Thursday, July 16, 2015

'अ टोस्ट टू आवर लव..'






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"ग़म की बिसात थी..
प्यादे आँसू से लबरेज़..

घोड़ा ढाई मुट्ठी नमक लाया..
ऊँट टेड़ी चाल से ख़ंज़र घोंप गया..

बेचारा हाथी..मजबूर था..
सीधे-सीधे लफ़्ज़ों से क़त्ल करता गया..

वज़ीर को तो महफूज़ रखना था..
सो..आनन-फ़ानन में..
रिश्तों का समंदर डुबो आया..

रानी..टूटी-बिखरी..
गुज़ारिश करती रही..
अपने मसीहा को पुकारती..
उसे पाने की चाह..
हर मकसद से ऊपर..

आसमां से तारे चटकते हैं..

आज भी..
घुलती रही..साँसों में..
प्लैनेट्स की पोजीशन चेंज वाली पेंटिंग..
जलतरंग पे बजता..रूह चीरने वाला राग..

मैं मदहोश..
अपने रेशों से सहलाता..
इस ६४ बाय ६४ के आवारा खाने..

पाट सकते..शायद..
ये ग़म के पुल..
लहुलुहान परछाई..

रूह के पन्ने..
ज़ालिम हैं बहुत..!!"

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--अ टोस्ट टू आवर लव..जां..

Sunday, April 19, 2015

'जागीर..'



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"इक आखिरी काश..इस रात का..
इक आखिरी जाम..इस बात का..

मोहब्बत के जिस्म थे..
इबादत की रूह..
छिला जो हाथ..
कोशिका मेरी थी..

मैं लिखता हूँ दर्द..
ख़फ़ा वो हो जाते हैं..
मैं कहता हूँ मर्ज़..
जफ़ा वो कर जाते हैं..

तुम बेबस हो..
मैं नहीं..
तुम शामिल हो..
मैं नहीं..

तह-दर-तह जमाता हूँ..
ज़िन्दगी के सफ़हों की..
सुनी क्या सरसराहट..
दिल धड़कने की..

बेच सकोगे जागीर अपनी..
भरी है हर कोने में..
यादें अपनी..

दुआ करूँगा..
कामयाबी की..
चादर ओढ़ना..
*आबादी की..!!"

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--तनहा सफ़र का एक पड़ाव..

*आबादी = आबाद..

Sunday, February 8, 2015

'सुना है..'




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"सुना है..

दिल के दर्द..
ख़ूबसूरती से लिखते हो..

मोती अश्क़ के..
बेदर्दी से पिरोते हो..

चैन जिगर के..
वफ़ा से चखते हो..

चिराग ग़म के..
नूर से तकते हो..

क्यूँ..आखिर मुझसे..
मुहब्बत करते हो..

सुना है..

तुम सेलेब्रिटी ऑथर हो गए..
अवार्डज़ भी दो-चार पा चुके..
सोशल साइट्स पर वांटेड हो..
विमोचन-समारोह में चीफ़ गेस्ट बनते हो..

पर..
मैं अब भी..अधूरी नज्में लिखती हूँ..
उंगली को दिल से जोड़े रखती हूँ..!!"

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--सिली मी..

Thursday, January 29, 2015

'बोसे की किरचें..'







‪#‎जां‬
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"सच..अब मुश्किल है मिल पाना..

गिरफ़्त तड़पेगी स्याह रातों में..कोई न होगा वहाँ..
अलाव रो उठेंगे..कौन गर्माहट भरेगा..
दरिया मचलेगा..कौन समेटेगा लहरों का वेग..
रूह रेशा-दर-रेशा चीरती रहेगी..अपना ही नखलिस्तान..
ज़ालिम-ज़ालिम कहती रही..
रेज़ा-रेज़ा बिक गयी हूँ..फ़क़त..!!!

ये दर्दे-नासूर चीखते हैं..हर पल.. मैं सुलगती जाती हूँ..कश्ती-ए-लकीर.. काश..इस काश ने न बाँधी होती अपनी मियाद.. वफ़ा ने न लुटाये होते अपने सितारे..
उस गोलार्द्ध से सींच पी लेती..बेशुमार लिहाफ़.. मेरे हमसाज़..मेरे ग़मगुसार.. क़ासिद से कहो..न बजाये घंटी के शंख..के अंगारों से सेज़ है..मेरी रोशन..!!

तजुर्बा मुहब्बत का..नींद के कच्चे गोले..गुलाबी जाड़े के तंतु.. पहले बोसे की किरचें..मुरीद हैं..तेरी छुअन के..

सपनों के कारवां..अब कहाँ चॉकलेट और स्ट्रॉबेरी की सौगात पा सकेंगे..

ता-उम्र ढोते रहेंगे..मेरे काँटों के पुल..

सच..अब मुश्किल है मिल पाना..!!"

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--नाज़ुक बूँद की जिजीविषा..

Friday, January 23, 2015

'बाम..'




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"रंज़िशों को आराम दे देते हैं..
आ..
चाँद को बाम दे देते हैं..

मलता रहेगा..
दीवारों पे अपनी..

रंगीं थीं..
कभी..
रंगरेज़ ने..

उस स्याह रात की..
बेहिसाब चीखों में..!!"

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Sunday, May 25, 2014

'प्यार का साज़..'





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"न जाने खुद की कितनी परतें उसके नाम लिखीं.. कितने विश्वास से समर्पित किया स्वयं को..!!

उसके फ़क़त..हर मोड़ मुझे छलनी किया..उकेड़ा मेरे लहू का क़तरा-क़तरा सरे-राह.. नीलाम किया वज़ूद मेरा..मज़ाक बनाया हर मजलिस..!!

मोहब्बत के रंग थे..या..प्यार का साज़..?? बे-रंग..बे-ताल..बे-बस.. नियति है मेरी..!!"


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--सफ़र लम्बा हो तो क्या..दर्द भी गहरे हो सकते हैं न..हर उस पल के..

Saturday, May 17, 2014

'इंतज़ार..'






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"चीखने लगा है..मेरे अंतस का सन्नाटा.. इक फुहार तुम्हारे स्पर्श की..और उषाकाल-सा अद्भुत दृश्य..!!"

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--इंतज़ार कब तलक..

Thursday, April 10, 2014

'चाँद..'






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"ए-दोस्त..
चाँद तुम्हें भी नज़र आता है न..
आज मैंने देखा..
तुमने देखा..
चाँद को तनहा-सा..
नहीं..नहीं..

तुमने तो उसे हँसते हुए देखा..
वो तो हार्टबीट माफ़िक..
बढ़ता-घटता है..

पर..
चाँद..चाँद तो तनहा ही होता है..

देखना तुम कभी..
मेरी नज़र से..
सोचना तुम कभी..
मेरे शज़र से..

पाओगे..

तन्हाई की चादर..
गीली साँसें..
और..
बेसबब उदासी..!!"

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Monday, March 24, 2014

'वाज़िब दूरियां..'






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"कितना कुछ कहती रही..
जाने क्या सहती रही..

ख़ामोश रूमानियत..फ़क़त..
दरिया-सी बहती रही..

वाज़िब दूरियां..बन लहू..
साँसों में रहती रही..!!"


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Saturday, March 15, 2014

'तस्वीर..'



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"धुंध में उठती तीस.. जिस्म पे सजी होंगी तेरी तस्वीर..!!"

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Wednesday, March 5, 2014

'बेशुमार परतें..'






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"मेरे दर्द को सींचा है तुमने..

जब-जब स्याह था आकाश..सितारों को बिखेरा तुमने..!! जब-जब था जाड़ा..बाँहों का कंबल ओढ़ाया तुमने..!! जब-जब तल्ख़ थी जेठ की दोपहर..गुलमोहर का स्पर्श लुटाया तुमने..!! जब-जब बेसहारा था बूंदों का काफ़िला..जिस्म का छाता बनाया तुमने..!! जब-जब रेज़ा-रेज़ा हुआ था वज़ूद..अलाव साँसों का जलाया तुमने..!!

आज जब उतार फेंकीं हैं बेशुमार परतें..फ़ासले दरमियां क्यूँ फ़ैसले करने लगे..??"

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--क्यूँ चले गए..आप होते तो मेरे दर्द को नया आयाम देते.. मेरे आँसुओं को नया मंज़र.. और बेबाक ख्वाहिशों को खंज़र.. मिस्ड यूँ बैडली.. :(