Showing posts with label ग़ज़ल... Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल... Show all posts

Thursday, September 3, 2015

'रात सुहानी है..'






...

"हारने की आदत पुरानी है..
अपनी इतनी ही कहानी है..

कौन समझेगा फ़लसफ़ा..छाई..
दुनियादारी वाली रवानी है..

क़त्ल..वस्ल..उल्फ़त..ज़ख्म..
बीत गयी इनमें ही जवानी है..

रक़ीब ग़मज़दा इन दिनों..
हबीब ने आज बंदूक तानी है..

बहर से बाहर बह रहा..वाईज़..
मेरी हक़ीक़त किसने जानी है..

हँस लो..मार ठहाके ज़रा..तुम..
न आनी..फ़िर रात सुहानी है..!!"

...

--ज़ख्म कैसे-कैसे..

Sunday, May 31, 2015

'नमकीं समंदर..'






...

"आसूँ जो बहते हैं..नज़र नहीं पाते..
मेरे घर सैलानी परिंदे नहीं आते..१..

आया करो..फ़क़त बाँध गमे-गठरी..
सुनो..दिन गिरफ़्त के रोज़ नहीं आते..२..

जानता हूँ..साज़िशें औ' क़वायद उनकी..
नक़ाब पे उल्फ़त वाले रंग नहीं आते..३..

गुलज़ार रहे ताना-बाना..सुर-ताल के..
क़द्रदान..नमकीं समंदर में नहीं आते..४..!!!"

...

--रॉ स्टफ..

Saturday, April 25, 2015

'तिलिस्म छुअन का..'



...

"तूने विश्वास मुझमें जगाया है..
क्या सच में..मुझमें कुछ पाया है..

मैं समझता रहा..खुद को आवारा..
तिलिस्म छुअन का..संग काया है..

मिटा देते हैं..चलो..अभी..जमी हुई..
जिस्मी-तिश्नगी..आँखों में जो माया है..

दूरी के तलाशो न बहाने..ए-‪#‎जां‬..
ये ब्रांड..फ़क़त..हमने ही बनाया है..!!"

...

--नाराज़गी वाला प्यार..रात्रि के दूसरे प्रहर..

Monday, January 6, 2014

'वादा-ए-उम्र..'






...

"सुनो, मुझे चाहना मुमकिन कहाँ..
टूटा दिल जुड़ना मुमकिन कहाँ..१..

तनहा हूँ..तनहा रहने दो..जो मिले तुम..
किनारों को उलटना मुमकिन कहाँ..२..

तुम जानते थे मजबूरियां..फ़क़त..
निभाना वादा-ए-उम्र मुमकिन कहाँ..३..

चले जाओ साकी..हासिल ख़ुशी..
मेरे कूचे..देखो..अब मुमकिन कहाँ..४..

अज़ीज़ रुक्सत..हम-जलीस ग़ैर..
आवारा नसीब..मोहब्बत मुमकिन कहाँ..५..!!"

...

Friday, August 31, 2012

'चुपके-चुपके..'






...


"हर लम्हा आँख नम कर जाते हो..
हर ख्वाब सज़ा कम कर जाते हो..१

पशेमां मौसम हुए जाते हैं..अब..
क्यूँ..तन्हाई में दम भर जाते हो..२

नूर से रंगी तस्वीर वो पुरानी..
फ़क़त..सांसों में जम* भर जाते हो..३

दर्द मचलता है चुपके-चुपके..
खामोशी से मुझमें रम जाते हो..४..

रिवायत-ए-मोहब्बत-ए-आलम..
दो गैरों को हम-दम कर जाते हो..५..!"


* जम = जाम..

...

'तमन्ना-ए-फिरदौस..'




...


"ज़मीर जो बिछड़ा रूह से..हुआ मलाल है..
ज़िन्दगी की कशमकश पर..उठे सवाल है..१

शिकार हुए नफरत में..गुलिस्तान कितने..
ख्वाबों की ज़मीं पर छाया..फिर अकाल है..२

सैलाब था जो दरमियान..रंगों से भरा..
सिमट गया..शायद..वहशत का कमाल है..३

कश्तियों में डूबा..बेजार आसमान-ए-चिराग..
तमन्ना-ए-फिरदौस..वाह..क्या ख्याल है..४..!"

...

'खामोश कदम..'





...


"अरसा हुआ..शब नहीं देखी..
साँसों ने हकीकत नहीं देखी..१

बेजुबान ही रहे..फरेबी अरमां..
वाईज ने मल्कियत नहीं देखी..२

अनजान मंजिल..खामोश कदम..
खंज़र ने शोखियत नहीं देखी..३

माहताब-सा हुनर कहाँ रकीब..
मुद्दतों से नसीहत नहीं देखी..४..!"

...

'कीमत-ए-जुदाई..'




...

"बेबसी..तन्हाई..जफा..
थोड़ी महंगी हुई...वफ़ा..१

पलटा नहीं साया..कभी..
था दूर..जो हर दफा..२

रंजिश पाबंद..रूह काफिर..
माज़ी हर नफ्ज़..खफा..३

फलसफा-ए-ज़िन्दगी..
कीमत-ए-जुदाई..नफ़ा..४..!!"

...

'भीगी शब..'




...


"दुनिया के मेले में बेकाबू हुए जाते हैं..
रूह की मस्ती में बेनकाब हुए जाते हैं..१

महफ़िल की चाहत..रुसवा ही करती हैं..
जाने किस राह फिर..चलते हुए जाते हैं..२

अब तक चिपके पड़े हैं..चाहत के अंगारे..
मुट्ठी में समंदर..कहाँ जलते हुए जाते हैं..३

भीगी शब..तन्हा महताब..आवारा साँसें..
क्या मुद्दत बाद भी..क़ैद हुए जाते हैं..४

ना आने का वादा..रिवायतों की होली..
क्यूँ..आखिर क्यूँ..पलते हुए जाते हैं..५..!"


...

Thursday, June 21, 2012

'तहखाने..'





...


"गुल सज़ाने हैं कई..
अश्क मंज़ाने हैं कई..१..

फ़क़त..जुर्म हैं साँसों का..
एहसास रज़ाने हैं कई..२..

शोखी निस्बत मौसम..
मसरूफ़ियत के फ़साने हैं कई..३..

नज़रें बेज़ुबां..सिरहन बेनक़ाब..
अदा के खज़ाने हैं कई..४..

क़त्ल-ए-आम दरिया हुआ..
कुर्बानी के तहखाने हैं कई..५..

चिकने ग़म-ए-हिजरां..
रफ्ता-रफ्ता गलाने हैं कई..६..!!"

...

Tuesday, August 16, 2011

'इश्क-ए-गुबार..'






...


"इश्क-ए-गुबार..जाने ना महबूब..
जिस रोज़ भूले क़यामत हुई..१..

बसे हो रूह में बन के धड़कन..
जिस रोज़ खिले नजाकत हुई..२..

आलम-ए-तन्हाई क्या जाने रकीब..
जिस रोज़ धूले बगावत हुई..३..

गम की आँधी चलती है तेज़ बहुत..
जिस रोज़ *जिले शरारत हुई..४..

दिखा दूं हूनर ना घबराना..वाईज़..
जिस रोज़ मिले हिमाकत हुई..५..!!"


...


*जिले = जले

Tuesday, February 1, 2011

'बूढ़े दरख्त..'




...


"मोहब्बत में सुलगे जिस्म..अब कहाँ मिलते हैं..
जिस्म से रूह के नाते..अब कहाँ सिलते हैं..१..

रहने दे बेरुखी का आलम..तेरे दर पे सनम..
बूढ़े दरख्त पे घरौंदे..अब कहाँ खिलते हैं..२..

उल्फत जगमगाती है सितारों को हर शब..
ज़ख़्मी आरज़ू-से रुखसार..अब कहाँ छिलते हैं..३..

वफ़ा की आँधी जलाएगी नश्तर..हर नफ्ज़..
हबीब की बाजुओं में ख्वाब..अब कहाँ हिलते हैं..४..!!"

....

Sunday, January 23, 2011

'नासूर-ए-इश्तिहार'




...


"हिज्र की खुशबू से..सिलसिले लिखे जाते हैं..
जिस्म के सौदे कहाँ..रूह में मिले जाते हैं..१..

जीने का सलीका नामंजूर..करे तो क्या..
बारहां..आईने संग से तौल सिले जाते हैं..२..

बाशिंदा हूँ कूचे का..वस्ल का गुल नहीं..
रखना महफूज़..हर नफ्ज़ सौदे खिले जाते हैं..३..

वाकिफ़ हूँ मोहब्बत से..मजबूरी के तोहफों से..
वहशत के रंगों से अंदाज़-ए-महफ़िल हिले जाते हैं..४..

लुफ्त उठाते आसमानी साये..काजल के कतरे..
नासूर-ए-इश्तिहार..ज़र्रे-ज़र्रे मिले जाते हैं..५..!!"


...

Sunday, November 21, 2010

'मसरूफ़ियत के फ़साने..'


...


"गुल सज़ाने हैं कई..
अश्क मंज़ाने हैं कई..१..

फ़क़त..जुर्म हैं साँसों का..
एहसास रज़ाने हैं कई..२..

शोखी निस्बत मौसम..
मसरूफ़ियत के फ़साने हैं कई..३..

नज़रें बेज़ुबां..सिरहन बेनक़ाब..
अदा के खज़ाने हैं कई..४..

क़त्ल-ए-आम दरिया हुआ..
कुर्बानी के तहखाने हैं कई..५..

चिकने ग़म-ए-हिजरां..
रफ्ता-रफ्ता गलाने हैं कई..६..!!"


...

Friday, September 17, 2010

'दिल की तारों पे..'


...


"जंग कदीम मिटा दूँ..लगें है दिल की तारों पे जो..
चर्चा मशहूर करा दूँ..जमे हैं साँसों के पारों पे जो..१..

दरिया निभाते हैं..दस्तूर-ए-महफ़िल-ए-हुस्न..
लूट लेना इंसानियत..दफ्न हैं कूचों के चारों पे जो..२..

मुसाफिर हूँ..शायर हूँ..यकीं मानो..रूह-ए-सौदागर हूँ..
कुरेद लो मोती..रज़े हैं समंदर की दीवारों पे जो..३..

फरिश्तें मिलेंगे..लहराती बस्ती के साये..देख लेना..
शुक्रिया वाईज़..रौशन हैं दिलदार की *हारों पे जो..४..!!"


...


*हारों = शिकस्त..

Thursday, August 26, 2010

'खुदा बुदबुदाता हूँ सबसे ज्यादा..'




...

"लपेट पोटली जज़्बातों की..छुपाता हूँ सबसे ज्यादा..
ना देख ले ज़माना..खुदा बुदबुदाता हूँ सबसे ज्यादा..१..

मौत से चुरा लाया तस्वीर-ए-चांदनी..
साज़-ए-महफ़िल..गुनगुनाता हूँ सबसे ज्यादा..२..

बेखबर शायरी..खूं से लबालब बेगैरत खंज़र..
बिखरे मरासिम..क्यूँ डुगडुगाता हूँ सबसे ज्यादा..३..

दास्तान-ए-ऐतबार मसला हुआ इस मौसम..
वाह..क्या एहद-ए-हसरत गुनगुनाता हूँ सबसे ज्यादा..४..

टपका जो आलम-ए-मोहब्बत..क़यामत होगी..
निचोड़ कश्तियाँ साहिल पे..कुलबुलाता हूँ सबसे ज्यादा..५..

कहते हैं वाईज़..शायर अजीब.. ना कोई ठिकाना..
राज़-ए-ज़िन्दगी नम आँखें..मुस्कुराता हूँ सबसे ज्यादा..६..!!"

...

Wednesday, August 25, 2010

'माज़ी भुलाता जाता हूँ..'


...

"जज्बा-ए-सौगात सुनाता जाता हूँ..
फ़क़त..समा-ए-गम दबाता जाता हूँ..१..

हुई ना तलाश मंजिल की..ए-वाईज..
हादसों से प्यास बुझाता जाता हूँ..२..

अलफ़ाज़ गिरेंगे पेशानी की जुबानी..
खलिश रूह की गहराता जाता हूँ..३..

गीली है बस्ती-ए-खुदा..जाने क्यूँ..
नजदीकियाँ फिर माज़ी भुलाता जाता हूँ..४..

निकला था इश्तिहार-ए-कफ़न जनाज़े का..
दरीचा-ए-मासूमियत नहलाता जाता हूँ..५..

बेवफा मजबूरी..थोड़ी स्याही-ए-गम..
वक़्त-ए-रुक्सत दफनाता जाता हूँ..६..

किया सौदा-ए-कूचा..गुनेहगार बन..
दरिया-ए-खून महबूब निकालता जाता हूँ..७..!"

...

Sunday, March 28, 2010

'फौलाद की फाहें..'


...

"बहुत सहमी सी हैं..आहें मेरी..
हर वक़्त उलझती हैं..राहें मेरी..१

जब भी चलता हूँ..बाँध के कफ़न..
बारहां..जकड़ लेती हैं..निगाहें मेरी..२

ना तन्हा..ना बेबस..है जुस्तजू..
फ़क़त..अरमानों से जूझती हैं..बाहें मेरी..३

थक के बैठ जाऊं..वो पत्थर नहीं..
रगों में बहती..फौलाद की फाहें मेरी..४..!"

...

Sunday, December 20, 2009

'उम्मीद..'

...

"बताया जो हाल-ए-दिल..रुसवा हो गया..
मंज़र देखिये..अश्क का रंग गहरा हो गया..

मेहरो-वफ़ा अजमाने की कोशिश में..
दफातन..फलक का चाँद अवारा हो गया..

ज़िन्दगी का अक्स..गुजरा साहिल के पार..
उम्मीद का दामन भी तुम्हारा हो गया..!"

...