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Tuesday, November 4, 2014

'रंग दो..'





#‎नवम्बर‬ आ ही गया है..

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"इक फुहार-सा..
महकाता..
मेरा अंतर्मन..

माइल्ड-सी ठण्ड से..
सहलाता..
मेरा उत्सव..

गुनगुनी-सी धूप से..
चहकाता..
मेरा सृजन..

रंग दो..
मेरी घड़ी..
इस घड़ी..!!"

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Wednesday, June 18, 2014

'जाने-बहार..'




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"तुम जाओ ना..
तह हदों की तोड़ के..

जिस्म मेरा छोड़ के..
रूह मेरी मोड़ के..

अजीब थी..ये दास्तां..
न समझे..ये मेहरबां..

क्या खलिश..
क्या कशिश..
तुम बिन..
बस..तपिश..

बाँध लो..
खुद से यूँ..
रहे बस..
जुस्तजू..

मैं तड़प रहा..
हर सूं..
सिलो न..
खुशबू..

आ जाओ..
बाँहों में..
खिले हम..
राहों में..

मेरे प्यार..
ऐतबार..

मेरे यार..
जाने-बहार..!!"

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--बस यूँ ही..बह चले..हर्फ़.. :-)

Friday, March 14, 2014

'इबारतें..'






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"इक टुकड़ा चाँद का पाती हूँ..
बादल से लड़ आती हूँ..
अजीब घटनायें..अब घटने लगीं हैं..
ज़िन्दगी की धूप..खिलने लगी है..

जाओ..के तुम आज़ाद हो..ए-दोस्त..
गिरफ़्त फ़क़त..दम घोंटने लगी है..

जश्न-ए-इबादत मुश्किल हुआ..
मसरूफ़ियत कुछ मसरूफ रही..
तेरी आँखें इमां मेरा..टटोलने लगीं हैं..

सफ़र की पाबंधी..वक़्त की नज़ाकत..
तुम खुश रहना..दुनिया बदलने लगी है..


आँधियों के अपने रेले हैं..
ख्वाहिशों के अपने मेले हैं..
तेरी ख़ातिर उंगलियाँ..
शामो-सहर इबारतें लिखने लगी हैं..!!"

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--वीकेंड का अथाह ज्ञान..:-)

Friday, August 31, 2012

'जिद..'




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"जिद है हमारी..

सूरज चाहिए अब..
तारे की पच्छी..

यादों का मौसम..
गुलमोहर की आगोश..

रेत के घरोंदें..
सरसों के खेत..

बैलगाड़ी की सवारी..

वो कच्चे आम..
वो मीठी इमली..
वो सौंधी मिटटी..

होली के रंग..
रामलीला का रावण..

जन्माष्टमी का मेला..

काका की जलेबी..
ताऊ के लड्डू..

चाचा का वो..
मलाई वाला दूध..

काकी का हलवा..
चाची का अचार..

ताई के गुँजे..


क्या दे सकोगे..

मेरा गुजरा बचपन..
वो खिलखिलाती हँसी..

सावन के झूले..

माँ का आँगन..
मिश्री-सी लोरी..!"

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Tuesday, October 25, 2011

'खलिश-ए-आगोश..'


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"अजीब दास्ताँ..
जिस्म अपना..
ना रूह से वास्ता..
बहते रहे..
शब भर..
ना हासिल..
फ़क़त..
आशियान-ए-खानाबदोश..!!!"


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Monday, October 24, 2011

'बचपन..'





कुछ वर्षों पहले लिखी थी..बिना कोई संशोधन पुनः प्रेषित हैं..



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"बचपन सहेजकर रखा था..
एक पुराने बक्से में..

कुछ खिलौनें..
कुछ गुड़िया..
कोई कश्ती..
कोई गदा..

कुछ तीर-कमान..
कुछ आँसू की पुड़िया..
कोई ताबीज़..
कोई धागा..

कुछ भूली-बिसरी यादें..
कुछ गुलमोहर के फूल..
कुछ इमली के बीज..
कुछ बगीचे की धूल..

थोड़ी मासूम-सी हाथापाई..
कुछ पुराने सिक्के..
कुछ गुड़ के चक्के..
कुछ सरसों और मक्के..

थोड़े पुराने ख़त..
कुछ तितालियों के रंग..
कुछ दरिया का पानी..
कुछ चबूतरे तंग..

कुछ खिलखिलाती तस्वीरें..
कुछ कुरते के बटन..
कुछ जूतों की तस्में..
कुछ यारों के टशन..

दीवाली की सफाई में..
सब बेच दिया है..

सुना है..

मार्केटिंग वाले..
सब एक्सेप्ट करते हैं..
इस फेस्टिव सीज़न में..!"


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Sunday, October 2, 2011

'मासूमियत की बौछारें..'




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"पहाड़ियों में ढूँढ आई..
बचपन की सौगातें..
हँसी की फुहारें..
और..
मासूमियत की बौछारें..
खिलखिला रहा था..
आसमान का आँगन..
झिलमिला रहा था..
बादलों का आँचल..

जी आई..
आज फिर..

अमूर्त भावनाओं की..
अटूट निशानी..
जीवन की..
अमूल्य कहानी..!!!"

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Friday, July 29, 2011

'रसीली मधुशाला..'




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"डूबी है रंग में आज रुबाई..
चलो..
फिर सैर पर चलें..

बिछी थीं..
मुस्कराहट की सुगंध..
तन की अभिलाषा..
जहाँ..

उगता था दिनकर..
साथ जीवन परिभाषा..

मद्धम उजाला..
इन्द्रधनुषी जिज्ञासा..

प्रेम आदर विनम्रता..
बहती थी हर क्षण..
संस्कारों की भाषा..

खुशहाली की चादर..
करती तृप्त पिपासा..

चलो..
खोज लायें..
दूरियां पाटने वाली..
रसीली मधुशाला..!!"


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Wednesday, July 27, 2011

'आजादी की जंजीरें..'




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"क्या कहें उनसे..
जानते हैं हाल-ए-दिल जो..

चूर हुए कुछ ख्वाब..
तो पाया उन्हें..

आजादी की जंजीरें..
बंदिशों की रिवायतें..

ना बाँध सकेंगी..
कभी..
मेरी रूह..
मेरी आरज़ू..
मेरी चाहत..
मेरी दोस्ती..!!"


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