Wednesday, October 9, 2013

'जिस्मों की रीलें..'







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"इस रूह से उठा..
उस रूह चला..
फ़ासले पाटता कैसा गिला..
जो तुम नहीं कोई ख्वाइश कहाँ..
मैं दीवाना..आवारा..
दश्तो-सहरा बिखरता रहा..
चल उठायें तम्बू की कीलें..
जाने कबसे पुकारती जिस्मों की रीलें..!!"

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6 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

Yashwant Yash said...

कल 11/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Onkar said...

वाह, बहुत खूब

parul chandra said...

बहुत सुन्दर

Priyankaabhilaashi said...


धन्यवाद यशवंत जी..!!
सादर आभार..!! देरी के लिए क्षमा..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद ओंकार जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद पारुल चंद्रा जी..!!