
...
"छोड़ देते हैं लूट..रूह की रूमानियत..
बिखेर देते हैं दहशत के अंगारे..
जला देते हैं आबरू की आंच..
दफ़ना देते हैं वजूद के रेशे..
चूस लेते हैं..इज्ज़त की रोटी..
निगल लेते हैं..इबादत की चादर..
पीस लेते हैं..सुकूं का गेँहू..
खा लेते हैं..बेखौफ़ी के पकौड़े..
कुछ इज्ज़तदार जवाबदार ठेकेदार..
तम्बू लगाये बैठें हैं..आला-दर्जे के बुतखाने में..!!"
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