Thursday, March 18, 2010

'जज़्बात..'



...

"नरम सफहों की..
बाँध गठरी..
रूह को तराशा फिर..

गुलों की महक..
इत्र हो जाती है..

बेजुबान अल्फाज़..
जज़्बात कई मर्तबा..
सुना जाते हैं..

रौशनी-ए-माहताब..
लूटा आई..
सुकूँ फिर..!!"

...

14 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

रानीविशाल said...

Bahut sundar.

Udan Tashtari said...

बढ़िया!

M VERMA said...

गुलो की महक
इत्र हो जाती है

खुश्बू है इस पोस्ट में

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

बेहतरीन प्रस्तुति ...

निर्मला कपिला said...

सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभकामनायें

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद ranivishal जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद उड़न तश्तरी जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद वर्मा जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद देवेश प्रताप जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद निर्मला कपिल जी..!!

Unknown said...

bahut jyaada pasand ayee

priyankaabhilaashi said...

Thnxx Gautam Sir..!!

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।