
...
"लिपट कर..
रोई बहुत..
गर्द से ढकी..
जुस्तजू से महकी..
दास्तान-ए-मोहब्बत..
गलीचा-ए-गुल..
नम हुआ..
गम-ए-शहनाई..
बाँह फैलाती..
तेरी और मेरी..
तस्सवुर की..
बहती हुई..
अरमानों की..
रूह में पनपती..
जिस्म में सुलगती..
तूफानी मंज़र..
आवारा..
मदमस्त..
मयकशी..
'शब'..!!"
...
4 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:
सुंदर, सटीक और सधी हुई।
बहुत सुन्दर!! आपकी रचनायें अच्छी होती हैं हमेशा ही!!
धन्यवाद उड़न तश्तरी जी..!!
Shubhan Allah ..!
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