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"ज़िन्दगी की एक किताब..
मेरे राष्ट्र के नाम..
भ्रष्टाचार..छल-कपट..
हर सेवक का व्यापार..
अपनी झोली भरते जाते..
झूठे वादे हमसे निभाते..
काला धंधा जिनका थोर..
बटोरते धन हर ओर..
नित नये व्यक्तव्य सुनाते..
अमल कभी न कर पाते..
कौन सुने जनता की पीड़ा..
हर कान जड़ा जो हीरा..
खाद्य-सुरक्षा कैसी योजना..
बंद करो घाव कुरेदना..
आखिर कब तक जालसाजी..
बहुत हुई ये मनमानी..
नहीं रुकेंगे..नहीं झुकेंगे..
तस्करों से नहीं डरेंगे..
अधिक अन्धेरा छा गया..
आम आदमी जाग गया..
संभल जाओ..ए-नादानों..
ढोओगे पत्थर-पत्थर खादानों..
कर दो समर्पण जो चुराया..
देगी भारत-माँ माफ़ी की छाया..
स्नेह से जो गद्दारी हुई..
स्वाँस तुम्हारी भारी हुई..!!"
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6 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:
बहुत सटीक रचना
latest post हमारे नेताजी
latest postअनुभूति : वर्षा ऋतु
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज रविवार (28-07-2013) को त्वरित चर्चा डबल मज़ा चर्चा मंच पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद कालीपद प्रसाद जी..!!!
धन्यवाद मयंक साब..
आभारी हूँ..!!
हालात का सुंदर प्रस्तुतिकरण ।
धन्यवाद आशा जोगळेकर जी..!!
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