Sunday, November 6, 2011

'नज़र-ए-महताब..'


...


"गुज़रतीं हैं साँसें..
यादों के गलियारे से..
जब कभी..

वफ़ा के साये..
झाँकते हुये..
छू जाते हैं..
अफ़साने कई..

वक़्त के पहिये..
लगाते हैं..
यकीं के तम्बू..

इठलाती पुरवाई..
लूटाती है..
साज़ कई..

ना सज़ा मिले..
मोहब्बत की कभी..


कुछ अल्फ़ाज़ यूँ भी..
नज़र-ए-महताब..
कूचा-ए-यार..!!"


...

17 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 07-11-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

sushma 'आहुति' said...

दिल को छूती पंक्तिया..

Prakash Jain said...

Bahut Sundar....

www.poeticprakash.com

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

वाह! बहुत उम्दा....
सादर...

M VERMA said...

उम्दा

Dr.Nidhi Tandon said...

खुदा करे ...ये यकीन के तम्बू....यूँ ही खड़े रहे...हमेशा !!

SAJAN.AAWARA said...

bahut hi shandar parstuti....
jai hind jai bharat

रचना दीक्षित said...

यादों के गलियारे से बहुत उम्दा रचना निकली है.

बहुत बधाई इस सुंदर अभिव्यक्ति के लिये.

चन्दन..... said...

बहुत हि उम्दा रचना|

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद चन्द्र भूषण मिश्र 'गाफिल' जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद प्रकाश जैन जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद संजय मिश्रा 'हबीब' जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद एम वर्मा जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद दी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद सजन अवारा जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद रचना दीक्षित जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद चन्दन जी..!!