Saturday, March 22, 2014

'दीवार-ए-रूह..'



...

"पढ़ती हूँ जब-जब..तुमको लिखे ख़त बेशुमार..
नमी दीवार-ए-रूह..जाने क्यूँ उभर आती है..

आज दफ़ना दूँगी..बेसबब यादें..जज़्बात..
परत जाने कितनी..आँखों पे जम जाती है..

ज़िद भर-भर थैले.. परेशां अब न करेंगे..
मायूसी तेरी साँसों में रम-रम जाती है..

दूर रहना मेरा..गर पसंद है तुमको..जां..
वादा निभाने ख़ातिर.. मैं नम जाती हूँ..!!"

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--मन उदास..अपुन आउटकास्ट..

7 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (23-03-2014) को इन्द्रधनुषी माहौल: चर्चा मंच-1560 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Virendra Kumar Sharma said...

बहुत सशक्त कही है गज़ल साफ़ लफ़्ज़ों में

Virendra Kumar Sharma said...

बहुत सशक्त कही है गज़ल साफ़ लफ़्ज़ों में

आशीष भाई said...

बहुत हि खूबसूरत रचना प्रस्तुति के साथ , आ० प्रियंका जी धन्यवाद व स्वागत हैं मेरे लिंक पे -
Information and solutions in Hindi ( हिन्दी में जानकारियाँ )

Priyanka Jain said...

सादर आभार मयंक साब..!!

Priyanka Jain said...

धन्यवाद वीरेंदर कुमार शर्मा जी..!!

Priyanka Jain said...

धन्यवाद आशीष जी..!!