Sunday, September 30, 2012

'किश्तें..'




...



"जिस्म के रिश्ते..
नासूर दे जाते हैं..
अक्सर..

बेवज़ह मरहम..
लगा जाते हैं..
अक्सर..

ज़रा..
गम-ए-जुदाई..
उधार दे जाना..

किश्तें चुकानी हैं..!"

...

6 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

लोग जुदाई से घबराते हैं और आप हैं कि उधार मांग रही हैं ... बहुत खूब

Unknown said...

धन्यवाद संगीता आंटी..!!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (01-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Unknown said...

धन्यवाद मयंक साब..!!

आभारी हूँ..!!

धीरेन्द्र अस्थाना said...

बेहतरीन वक्तव्य !
जरा गम-ए- जुदाई
उधर दे जाना
किश्तें चुकानी हैं !

Unknown said...

धन्यवाद धीरेन्द्र अस्थाना जी..!!