Sunday, June 14, 2015

'माँ..'



...



"संदर्भ था..माँ का..
साज़ था..माँ का..

अंतर्मन-रेखाओं पे..
पट्टा था..माँ का..

प्रतीक्षारत पौधे को..
नाज़ था..माँ का..

कोमल-डोर सींचने में..
दाम था..माँ का..

इन्द्रधनुषी छतरी को..
भरोसा था..माँ का..

चरित्र-निर्माण में..
ताप था..माँ का..

जटिल जीवन-अंक में..
सामीप्य था..माँ का..

काल-चक्र छाँव में..
स्नेह था..माँ का..!!"

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6 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-06-2015) को "घर में पहचान, महानों में महान" {चर्चा अंक-2008} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

priyankaabhilaashi said...

सादर आभार..मयंक साब!!

ज्योति-कलश said...

sundar prastuti !

priyankaabhilaashi said...

हार्दिक धन्यवाद..ज्योति-कलश जी..!!

संजय भास्‍कर said...

बहुत ख़ूब !

और आपके निराले अंदाज़ में प्रस्तुत कविता भी कमाल है

priyankaabhilaashi said...

हार्दिक धन्यवाद..संजय भास्कर जी..!!