
...
"कोई रख सकता जन्नत आँखों में..
कोई लपेट देता लिहाफ़ लज्ज़त के..
कोई जला देता साँसों की सिगड़ी..
कोई बिछा देता आहों की लकड़ी..
सुलगती रहती रेज़ा-रेज़ा..
गहराती जाती वफ़ा तह-दर-तह..
काश..
माज़ी लकीरों का सौदा ना करता..
हसरतों का बाकी कोई रेला ना होता..!!"
...
1 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:
धन्यवाद निलेश माथुर जी..!!
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