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"आँगन में फैला वो पुराना जामुन का पेड़ पूरे शबाब पर था..जलती दोपहरी, अलसाती दूब, मुरझाती चमेली, शर्मीली मेहन्दी, इठलाती चंपा, सुर्ख़ तपती बजरी, तनहा चूल्हा, अंगारे-सी तपती खाट...सब कुछ सूना-सा..
कमी थी तो बस उन शैतान तस्वीरों की, जो आज ना जाने किस डर से माँ के आँचल में छुपे बैठे थे..!!! शायद, सुबह-सुबह किसी मनचले ने मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया.. न जाने कितनी बिजलियाँ गिरीं होंगी उन मासूमों पर, जो अपना गम भूला पूरा दिन सजाते हैं आशियाँ उन बाशिंदों के लिए जो उन्हें तहस-नहस कर हँसते हैं..!!!
ज़ालिम ज़माना..!!!"
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