Thursday, June 13, 2013

'अनमोल धरोहर..'




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"शीर्ष से उठ थाम अभिराम-चेतन..प्रस्फुटित होती हैं अनेक आकांक्षाएँ..!!! जानते हो न..ह्रदय की मलमल शाख का अविभाजित मूल्य..तुम अतुल्य हो, अमूल्य हो..!!

मेरे जीवन की अनमोल धरोहर हो..!!"

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Tuesday, June 11, 2013

'बेगैरत..'




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"क्या सब कुछ स्कोर पर डिपैंड करता है..
मेरी सक्सेस से ही सब अस्सैस करते हैं..
मेरी वैल्यूज़, एथिक्स की कोई वैल्यू नहीं..
मेरा कंसर्न नज़र नहीं होता कभी..
बर्बाद ही सही..इतनी बेगैरत भी नहीं..!!"

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--ऐवें ही..

'शफ़क़..'



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"बेदख़ल..
ज़ुल्फों को कर दूँ..
या..
घटाओं को..

सिलवटों को..
या..
करवटों को..

साहिलों को..
या..
सैलाबों को..

मुमकिन नहीं..
रेगिस्तां में शफ़क़..!!!"

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Monday, June 10, 2013

'प्यारे दोस्त..'



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"मेरी ज़िन्दगी के
पहले रंग..

मेरी आशिकी के..
पहले रसरंग..

मेरे अरमानों के..
पहले जलतरंग..

मेरी खुशबू के..
पहले हुड़डंग..

चल लूटें..
हर पतंग..!!"

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---प्यारे दोस्त मुझमें तुम..तुममें मैं..

Sunday, June 9, 2013

'फ़रियाद..'



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"मेरे रहगुज़र में करीब..
मेरी ज़िन्दगी के हबीब..

जा लौट जा..

संग-सी चाहत..
और..
फ़रियाद..

मुमकिन नहीं..!!"


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Wednesday, May 29, 2013

'पहला पड़ाव..'



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"राजधानी की यात्रा..
पहला पड़ाव हमारे प्रेम का..
याद है न..??

कल फिर से जा रही हूँ..

स्मृतियों को मिटाने..
चिपकी हैं जाने कबसे..
मीलों दौड़ती सडकों की रोड़ी पर..

सुगंध छुड़ाने..
फैली है जो..
हर वृक्ष की छाल में..

रंग बिसराने..
रमे हैं जो..
नीले आकाश पर..

भूल आऊँगी..
बहा आऊँगी..
अंतर्मन की नीव..
शेष कहाँ मेरा जीव..!!"

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--- सितम्बर २०११.. याद है न आपको..

Tuesday, May 28, 2013

'ख़ता..'




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"ऐसी ख़ता हर शाम मेरे साथ हुई..
कतरी ख़ुशी फ़क़त मेरे नाम हुई..!!"

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Tuesday, May 21, 2013

'आवारा वज़ूद..'






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"रिश्तों का बोझ यूँ भी उठाते थे हम..तेरे मिलने के बाद जीने लगे थे..!! तुम्हें जाना था चले जाते..क्यूँ नापे फ़क़त जिस्म के रेशे.. रेज़ा-रेज़ा छिल गयी रूह और तुम्हें मुझसे बाबस्ता ना रहा.. क्यूँ इतने करीब लाये कि साँसें भूल गयीं चलने, बिन तेरे..!!!

किसी सज़ा से डरता नहीं..तेरी ख़ामोशी चीर चुकी रग-रग.. स्याह बेज़ुबां आवारा वज़ूद..!!!!"

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---कुछ फैसले आपके हाथ में नहीं होते, बस निभाने पड़ते हैं..जैसे..जीना तुम बिन..

Monday, May 20, 2013

'ज़िंदा जिस्म..'





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"दफ़अतन तुम्हारे ज़ेहन से कैसे उतर गयी..गिर बाँहों से गर्द हो गयी.. क्या गुनाह हुआ..कहाँ छूटी तपिश.. तड़पती रातें..फफकती साँसें..बेआबरू रूह..!!!

एक रत्ती मिट्टी..एक गज़ सूत.. ज़िंदा जिस्म..बेबस हसरत..अदद अश्क..बोझिल आँखें.."

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---तेरे बिन थक गयीं हैं आहें..

'खंज़र..'






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"खंज़र को धार नहीं लगती..
ज़ख्मों को खार नहीं लगती..

दर्द मेरा क्या जानेगा ज़माना..!!"

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Sunday, May 19, 2013

'इक गमला..'




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"तेरी याद का इक गमला रखा था जो मेज़ पर साथ बीते पलों के बीज वाला..फलने-फूलने लगा है..जब भी वहशत का तूफां आता है, नर्म साँसों की टहनी रूह की वादियों में कर देती है बौछार..!!! सिलवटों का असर उतर आया है गुलों की रंगत में..उँगलियों के पोर से सहलाती हूँ जब पत्तियाँ, कसती गिरफ़्त बढ़ा जाती है धड़कन..!!!

पर तुम नहीं होते हो..और यूँ ही मचलता है आफ़ताब की चांदनी से इसका जिस्म.. तरसती रूह हर शै वास्ते, मेरे जोगिया..!!!"


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---सन्डे नाईट थॉट्स..

Friday, May 17, 2013

'दूरियां..'





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"कुछ तीस दिन गुज़र गए..ना जाने कितनी सदियाँ बीत गयीं..तुम नहीं आये..!!! किस ज़ुर्म की सज़ा पा रही हूँ..नहीं जानती.. रेज़ा-रेज़ा राख़ में तब्दील होती रूह की तकदीर..!!!"

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---दुनिया गले लगाती रही, इक तुम ही दूरियां बढ़ाते रहे..

Sunday, May 12, 2013

'जिस्म की आँच..'



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"टपकती..
छनती..
साँसों की तार से..
मोहब्बत की चाशनी..

पकाया बहुत देर..
जिस्म की आँच पर..

रूह की तासीर बदल गयी..
तेरी इक छुअन से..

लज्ज़त ज़ुबां पर..
रेज़ा-रेज़ा लुफ़्त..
सलीका-ए-तपिश..
लब पे पैबंद दरिया..

अहह..
रूहानी सफ़र..
इक..
तेरा कूचा..!!!"

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'माँ..'

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"माँ के लिए भी सिर्फ एक दिन.?? ऐसा लगता है..या तो संसार विचित्र है या मुझ जैसे थोड़े और लोग भी..!!

बड़ा अद्भुत है परम-कृपालु मार्केटिंग वालों का जंजाल और उससे भी अधिक सुंदर है आजकल लोगों का बदलता हुआ मानसिक परिवेश..!!"

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---सो-कॉल्ड मदर्स डे पर..

Saturday, April 27, 2013

'इक शब..'




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"किरच-किरच टपकती रही..
हर्फ़ से सनी धूप..

तुम सब जानते थे..
मेरा खालीपन..
मेरी वहशत का जिस्म..

क्यूँ बुलाते थे उँगलियों की घुटन को..
इतने करीब कि फिसल जाती थी..
मेरी बेबसी उन पन्नों पर..

बमुश्किल समेटा था..
उस रोज़..
स्याह शाम का अल्हड़ मंज़र..

तेरी छुअन..
मेरी रूह..
और..
इक शब..
वहशत की..

याद रखोगे ना..
मेरी इबादत..
मोहब्बत की..!!"

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Thursday, April 25, 2013

'ख़्वाब..'



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"कल रात ख़्वाब की चादर ओढ़े तुम मेरी चादर की सूत बन लिपटी रहीं.. अपने शहर से मेरे शहर का सफ़र..दुनिया की नज़रों से छुपते-छुपाते..मुझ तक आयीं तुम..!!!

ना जाने किन ख्यालों में खो गयीं थीं तुम्हारी उदास आँखें..मैं ढूँढता रहा अपनी कार में तुम्हें..!! बरबस बहते ही जा रहे थे..तुम्हारी काली आँखों से बेशुमार मोती..कार के डैशबोर्ड पर रखे टिश्यू पेपर बॉक्स से एक सफ़ेद टिश्यू निकाल तुम्हें जैसे ही दिया..तुम बिफर गयीं..जैसे एक बिजली गिर गयी थी मुझ पर..!!! इतना कमजोर और बेबस कभी महसूस नहीं किया था ख़ुदको..!!

क्यूँ ज़िन्दगी ऐसे मुकाम पर ले आती है, जहाँ हमारा सबसे प्यारा दोस्त सामने हो और उसे संभाल भी नहीं सकते..बांहों में भी नहीं भर सकते..!!! तुम्हारी ख़ामोशी मुझे चीर रही थी..सहला ना सका तुम्हारे ज़ख्म, जल गया मेरे होने का दंभ.. कितना बैगैरत..संगदिल..

दफ़अतन..ख़्वाब टूट गया..और किरच-किरच बिखर गए सपने..!!!"

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--सुबह से बहुत मिस कर रहा था तुम्हें..!!! कर सकता हूँ ना..??

'सुराही..'



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"हम कितना भी भर जाएँ..
फिर भी खाली ही रहते हैं..

रीत रही..सुराही आज फिर..!!!"

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---जहाँ भी चली जाऊं, मैं तुम्हारे पास ही रहूँगी हमेशा.. लास्ट नाईट कन्वर्सेशन..

Wednesday, April 24, 2013

'बहते हर्फ़..'





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"इक-इक क़तरा..
इक-इक साँस..

दफ़्न कर..
चल पड़ा..

खैरियत चाह..
दूरियां फैलायीं..

ना भूलूँगा..
दरिया-ए-शफ़क़त..

शुक्रिया तुम्हारा..
मेरी जां..

निभाया तुमने..
दोस्ताना हमारा..!!"

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-- आग़ोश के दो पल..बहते हर्फ़..

'रत्न ..'



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"मुश्किल अवश्य है प्रश्न..
पर कुछ तो होगा हल..
चलिए, आप और मैं ढूँढें..
कोई रत्न हो बैठा थल..!!"

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Friday, April 19, 2013

'वज़ूद की ख़ाल..'






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"वज़ूद की ख़ाल अब पुरानी हो चली है..लौटाना चाहता हूँ वो सारे पल..वो सुन्दर मोतियों-सी लिखावट..जिससे मेरे नाम के अक्स बिछते थे सूत की चादर पर हर शब दरिया किनारे..!!!"

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Wednesday, April 17, 2013

'बेवफ़ाई..'





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"घौंपों चक्कू कितने..
बेवफ़ाई के..
लहू में दिखेगा..
इक तेरा चेहरा..!!"


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Thursday, April 11, 2013

'बेज़ुबान हर्फ़..'



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"उग आये हैं..
बेज़ुबान हर्फ़..
जिस्म के हर कोने..
क्या मुनासिब..
इक छुअन कभी..!!"

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Monday, April 8, 2013

'दूर..'





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"दूर हो मुझसे कब तक जी पायेगा..
देखते हैं..कौन कहाँ तक जायेगा..!!"

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Saturday, April 6, 2013

'उलझती-सुलगती..'



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"उलझती-सुलगती छल्लों की कारीगरी..
चल बिछायें इन पर..शब्दों की जादूगरी..!!!"

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Wednesday, April 3, 2013

'जिद्दी यादें..'



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"बंद करूँ खिड़कियाँ कितनी..
खींच डालूँ दरवाजे बेशुमार..

जिद्दी यादें..जातीं ही नहीं..!!"


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