Saturday, January 22, 2011

'रखना महफूज़..'




...


"जिस्मों को कुरेदने से..
रूह छिल जाती है..
आता हूँ साहिल पे..
कश्ती मचल जाती है..
बाशिंदा हूँ..
कूचे का..
रखना महफूज़..
मोहब्बत से..
अक्स ज़ख़्मी हो जाते हैं..!!"

...

16 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

vandan gupta said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (24/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

Unknown said...

ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।
खूबसूरत बात।

शुक्रिया।

Kunwar Kusumesh said...

वाह, क्या बात है

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मुहब्बत से अक्स का ज़ख़्मी होना ..गज़ब की सोच ...

दिगंबर नासवा said...

सही है मुहब्बत जख्म ही देती है ... छलनी कर देती है ...

Parul kanani said...

waah..kya khoob keha.. ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।

सदा said...

बहुत खूब कहा है आपने ।

उपेन्द्र नाथ said...

जिन्दगी की कड़ुवी सच्चाई

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद वंदना जी..!!

बहुत आभारी हूँ..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद समय जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद कुंवर कुसुमेश जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद संगीता आंटी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद दिगंबर नास्वा जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद पारुल जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद सदा जी..!!

priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद उपेन्द्र 'उपेन' जी..!!