"मेरे हर उस खालीपन को..भर जाते थे तुम..
उँगलियों से अपनी..किस्सा गढ़ जाते थे तुम..
दरमियाँ होतीं थी..अनकही बातें..औ' कशिश..
चहकता था..कुछ यूँ..रूह का इक-इक पुर्ज़ा..
गर्माहट से अपनी..साँसें निहार जाते थे तुम..!!!"
"दरार जिस्म पे थी..या..रूह की डाली यूँ ही विचलित हुई.. कुछ रिश्तों में साँसें ही साक्ष्य देतीं हैं.. अनगिनत रातों की स्याही..ग़म के रंग कैनवास पर छेड़तीं हैं..राग भैरवी..
'मैं' समेटती आवारगी वाले हिसाब..स्पर्श की सुगंध से सराबोर मुहब्बत वाला हग़..और मेरा सफ़ेद लिबास..!!"
"इंतज़ार ख़्वाब करने लगे हैं..और कितना तड़पेंगे.. इतने साल चुप-चाप बैठे रहे सबसे नीचे वाले दराज़ में..हाँ-हाँ दिल के सबसे नीचे वाले दराज़ में.. अब तो उनको भी अपने ख़्वाब पूरे कर लेने दो..!!!!
'जा जी ले अपनी ज़िन्दगी' टाइप्स... काश, इतना आसां होता न ये सब.. तो यूँ ही नहीं बिखरते हर शाम दहलीज़ पर मेरे अल्फ़ाज़ और उनकी संगदिल बहर..!!"