Monday, October 17, 2011

'समाज..'




...


"सुलझ गयीं..
गांठें कितनी..
तेरी इक मुस्कराहट से..

व्यर्थ ही..
लुटती रही..
समाज के संकीर्ण फेरों में..!!"

...

9 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

SAJAN.AAWARA said...

EK MUSKAN BHI BAHUT KUCH KAH JAATI HAI....
BAHUT HI BADHIYAA RACHNA
JAI HIND JAI BHARAT

M VERMA said...

बहुत सुन्दर
मुस्कराहटो ने न जाने कितनी गाँठे सुलझा दी हैं

संजय भास्कर said...

वाह …………क्या खूब कहा है……………बहुत सुन्दर्।

संजय भास्कर said...

जरूरी कार्यो के कारण करीब 17 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद मयंक साहब..!! आभारी हूँ..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद सजन अवारा जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद एम वर्मा जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!