Tuesday, January 28, 2014

'सव्वाली ही रहा..'











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"कैसी तलब थी.. कुछ न समझ सका..
आवारा था..आवारा ही रहा..

हँसी-खेल में मिटाता रहा जज़्बात सारे..
तनहा था..तनहा ही रहा..

बहर..रदीफ़..मतला..
सब खफ़ा हैं..
हर शे'र अधूरा था..अधूरा ही रहा..

बेरुख़ी इक तेरी सह न सका..
जुदा हुआ कैसे तेरी रूह से..
जो हुआ जुदा..जुदा ही रहा..

उम्मीदें बेवज़ह साहिल पे तैरतीं..
गहराई नापता मैं..
नादां था..नादां ही रहा..

बेइंतिहां मोहब्बत है तुझसे..
'जां'..
सव्वाली था..सव्वाली ही रहा..

न भरना बाँहों में कभी..
बर्बाद था..बर्बाद ही रहा..!!"

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--काश तुम सुनते..वो जो मैंने कभी कहा ही नहीं..

Tuesday, January 21, 2014

'अलाव की शाम..'




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"उम्मीद का दामन थाम निहारता रहा..तनहा था हर छोर, जाने क्यूँ हाँफता रहा.. मेरा माज़ी..अब तलक पेशानी पे बोसे जड़..मेरी खुरदुरी लकीरों को सहलाता है..!!

तलाश में हूँ..उस सहर की जो शुरू हो तेरे अलाव की शाम से..!!"

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'अनुचित-सा मौन..'







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"तरण-ताल पर तैरता मौन..शांत-सा गहरा मौन..मेरे अंतर्मन को मापता..!! जब-जब बहता है अनुचित-सा मौन..अधिकाधिक कष्टदायक ही होता है मौन..!!"

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--कठिनतम चढ़ाई..

'जां..'







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"बिखरा है रंग तेरा..हर शै पे जानिब.. इन दिनों बहुत बोलता हूँ मैं..'जानिब'..!!! अब 'जां' बोलने से डरता हूँ..इक तुमपे ही मरता हूँ..!!

अब सब बेज़ार-सा है..
तुम्हें भी इंतज़ार-सा है..??

जाने देते हैं सब बातें..फ़ायदा क्या उस मचान का जहाँ साथ रुक न सकें..!!"

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--संडे ग्लोरी..

'मखौल..'





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"सपनों के टूटने पे आवाज़ नहीं होती इन दिनों..छुट्टी पर होंगे सब..

मखौल अपना बना क्या मिला..कल भी तुझसे दूर था..आज भी वहाँ ही रहा..!!"

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--ज़िन्दगी की कहानी..

'साँसों में खलिश..'




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"इक सच मेरा तुझसे रहेगा जुड़ा जब तक है साँसों में खलिश.. तुम चाहो न चाहो..!!"

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Friday, January 17, 2014

'ग़ैरों के आँगन..'




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"नीलाम हुआ तेरी गली तो अच्छा लगा..बिकता जो ग़ैरों के आँगन तो मोहब्बत मेरी ज़ाया होती..!!!"

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--अलविदा..

'नादां दिल..'






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"कहीं धुआं उठता रहा..
कहीं सुलगता रहा जिस्म..
कहीं धड़कने की ख़्वाहिशें थीं..
कहीं नादां दिल..
किसे समझाता..किसे बहलाता..
दोनों अपने थे..
और..
मैं बेगाना..!!"

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--एहसास कुछ पुराने..नए सिरे से..

Friday, January 10, 2014

'उस क्षण के गवाह..'




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"मेरे प्रिय..मेरी जां..

आपसे ही ख़ुद को पहचान पायी..आपसे ही अपने वज़ूद के होने का तमगा मिला..!! मेरा क्या था, मेरा क्या है?? मैं जीवन की उपलब्धियों को दरकिनार कर..अपना करियर दाँव पर लगा चुकी थी..क्यूँ आप उसमें साँसें फूँक गए??

मेरे अपने ही मुझसे दूर थे और आप इतने दूर होते हुए भी मेरे अपने..!!

मेरे हर उस क्षण के गवाह..जब-जब मैंने आँखों के समंदर को आपके काँधे पे उड़ेला था.. अपनी गोद में सुला आप मेरी आँखों में गहरे धंसे सपनों के बारीक टुकड़ों को निकाल सहलाते थे मेरा सर.. उस एक 'टाईट हग' से मेरे सारे इन्हिबिशंज़ थक-हार जाते थे..

कैसे आप समझ लेते थे..जो मैं कह भी नहीं पाती थी..??

आज फिर से 'सबब दिल धड़कने का' कुछ कह रहा है.. चाँद की रातें भी रोशनी माँग रहीं हैं '११६' वाली.. और फिर..'बहुत दूर होके बहुत पास हो तुम..'..

वस्ल की रात वाली दुआ अता हो..

नाम यूँ भी बदनाम है मेरा..!!"

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--आपको ही चाहा है..ता-उम्र चाहूँगी..

'गैजेट्स की गली..'







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"झिलमिल तारे जाने कबसे मेरा ओढ़ना-बिछौना रहे हैं.. झाँकती है रूह से मुलायम घराने की बेसबब यादें.. भर जाती है आँखों के पोर में सेर-सेर मोतियों के ठेले..!!

पाबंदियां वक़्त की..रवायतें ज़माने की..अहमियत खोते हर्फ़..फरेबी जिस्म लगाये रिश्ते.. ये ही सच्चाई..!!"

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--मासूमियत खो गयी गैजेट्स की गली..!!

Monday, January 6, 2014

'वादा-ए-उम्र..'






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"सुनो, मुझे चाहना मुमकिन कहाँ..
टूटा दिल जुड़ना मुमकिन कहाँ..१..

तनहा हूँ..तनहा रहने दो..जो मिले तुम..
किनारों को उलटना मुमकिन कहाँ..२..

तुम जानते थे मजबूरियां..फ़क़त..
निभाना वादा-ए-उम्र मुमकिन कहाँ..३..

चले जाओ साकी..हासिल ख़ुशी..
मेरे कूचे..देखो..अब मुमकिन कहाँ..४..

अज़ीज़ रुक्सत..हम-जलीस ग़ैर..
आवारा नसीब..मोहब्बत मुमकिन कहाँ..५..!!"

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Wednesday, January 1, 2014

'ज़ालिम टुकड़े..'






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"कितने करीने से..कितने सलीके से बिखरते हैं..हर ओर..!! जहाँ भी जाऊँ..पीछा करते हैं.. कार के डैशबोर्ड पर..स्टडी टेबल के ग्लास पर..मोबईल की स्क्रीन पर..डाईनिंग मैट्स पर..मार्बल फ्लोरिंग पर.. किताबों के शैल्फ़ पर..

कितने वफ़ादार हैं..ये टूटे हुए सपनों के ज़ालिम टुकड़े..!!!"

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--रहगुज़र तलाशते ख़ानाबदोश..

Monday, December 30, 2013

'धरती-माँ..'






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"बहुत हुए 'जां' के नाम स्टेटस..आज कुछ अलग होगा..


'वज़ूद..पहचान..ईमान तुझसे है..
शुक्रगुजार हूँ..साँसें तुझसे हैं..

कतरा लहू का..बहा दूँगा..
मेरी शान..ए-वतन..तुझसे है..

पा तुझे ज़िन्दगी है पायी..
रवानी..कहानी तुझसे है..

मकां..दुकां..दो वक़्त रोटी..
चादर-ए-इनायत तुझसे है..

गुरूर क्या करूँ झूठे तन पे..
क़फ़न की दरकार तुझसे है..

पेशानी पे माटी सजे..भारत-माँ..
हर शै की आज़ादी तुझसे है..!!'


धरती-माँ की शान में यूँ ही कुछ शब्द..!!"

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कृपया बहर..रदीफ़..मतला..मीटर..सब को आराम करने दीजिये आज.. :-)

Thursday, December 26, 2013

'दर्द और आगोश..'






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"कोहरा पंख फैलाए बैठा रहता है..हर रोज़ कहता है, "आओ, तुम्हें तुम्हारी 'जां' से मिलवा लाऊँ दुनिया की नज़रों से छिपा कर.. क्यूँ तड़पते हो दिन-रात..?? जाओ, भर लो ना आगोश में जो तुम बिन जी नहीं सकते..!!"

हमने कहा, "सुनिए, कोहरा महाशय..दर्द और आगोश अब दोस्त नहीं रहे.. हम उनके नहीं हो सके.. शायद, वो भी हमें न भुला सके..!! पर मियाद पूरी हो गयी..!! वक़्त के साथ सब बह गया..जो रह गया वो मैं हूँ..!!! टूटा..बिखरा..बर्बाद..बेज़ुबां..बेगैरत..तनहा..फ़क़त मैं..!!"

मान जाओ, कोहरा बाबू.. कुछ नहीं रखा इन सब में..!! जाओ, अपना कर्तव्य निभाओ..!!"

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--तुम बिन दिल जिंदा नहीं अब..

Sunday, December 22, 2013

'वो मैं था..'






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"सब कुछ जो असंभव हुआ करता था..
आज संभव हो चला..
मैं जिस राह का पथिक न था..
वहाँ राज करने लगा..
मेरा भाव किसने जाना..
मैं रोधक तुम्हारा होने लगा..

न पढ़ सकोगे कभी..
अंतर्मन लिपि..
तुम्हारी दृष्टि में..
अपराधी जो हो गया..

समय का दोष था..
या..
परिस्थिति का रोग..
जो पिसा..मिटा..
वो मैं था..
हाँ..
वो मैं ही था..!!"

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'स्याह दूरियां..'







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"जब-जब WhatsApp पर कोई मैसेज आता है.. वो पल आँखों में कितने सपने सजा जाता है..!! याद है न--'एक सौ सोलह चाँद की रातें..'....'एक तुम्हारे काँधे का तिल..'...

उसी काले तिल का एहसास..तुम्हारी छुअन का वो खूबसूरत लम्हा..रूह को तड़पा जाता है..!!"

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--स्याह दूरियां..बेबस आसमां..

Wednesday, December 18, 2013

'किस्सा..'




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"करीब आना फ़ासले बढ़ाना..
मुमकिन कहाँ..तुम्हें भुलाना..

अधूरी हूँ..अधूरा ही रहने देना..
किस्सा जो हुई..किस्से होंगे..

टूटी कश्ती के किनारे बैठा..
मुर्दे माफ़िक़ मेरा गुरूर ऐंठा..

पिघल रही..बह रही..आज फिर..
सम्भाल लो..मेरे ज़ुल्मी मुसाफिर..!!"

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'आँखें..'






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"कितने राज़ खोलती है..
कितने समेटती है..

तुम्हारी हर बात..
जाने क्या बोलती है..

मैं सुन भी न पाऊँ..
फिर भी थामे रखती है..

उदास कहूँ या अलहड़..
कितनी अंदर झकझोरती है..

तुम क्या जानोगे..
सच ना मानोगे..

संयोग से मिलना..देखो..
आँखें कैसे पुचकारती हैं..!!"

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Monday, December 16, 2013

'हर्फ़..'





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"मेरी किस्मत..वहशत..तन्हाई..
हर्फ़ रुक जाओ..
कुछ देर तुम ही मेरे करीब बैठ जाओ..
कोई नहीं रहा यहाँ..अब जाऊँ कहाँ..

किस्से मेरे बिकते हर रोज़..
मैं बैगैरत..आवारा रहूँ..
इतनी दुआ अता करना..!!"

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Sunday, December 15, 2013

'ज्वनशील तत्व..'










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"हम कभी-कभी कितने बेबस हो जाते हैं न.. आज चाहते हुए भी किसी की फोटो लाईक नहीं कर सकती, वैसे अच्छा ही है.. दो शब्द अगर तारीफ़ के लिख दूँगी तो अपनापन बढ़ जाएगा और फिर जाने कितने भाव उमड़ आयेंगे..

और फिर..कितने ज्वनशील तत्व उत्पात मचायेंगे..!!!

जीवन-धारा को बहने देती हूँ..
अपनी डगर पर चलती रहती हूँ..
मेरी पसंद-नापसंद से क्या होना है..
मैं अक्सर..यूँ ही कहती रहती हूँ..!!"

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--कुछ सन्देश जो दिल से दिमाग तक पहुँचने में बहुत समय लगाते हैं..

Thursday, December 12, 2013

'पत्र की पात्रता..'



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"वो मिठास कहाँ..
धैर्य और प्रेम का वो संगम कहाँ..
विश्वास की मजबूत धरोहर कहाँ..

सब बह गया..
समय की धार में..

सुन्दर..मोती-से अक्षर बोलें कहाँ..
पत्र की पात्रता ही सुरक्षित कहाँ..!!"

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--सुनहरी स्मृतियाँ..

Wednesday, December 11, 2013

'बेदख़ल होतीं राहें..'




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"खुशियाँ भी झूठी हैं..गम तो अपने रहने दो..!! सुनो, चाहे जितना दम लगा लेना..मुझसे न ले सकोगे अपनी रूह का हिस्सा..जो सिर्फ मेरा है..और ता-उम्र रहेगा..!!"

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--बेदख़ल होतीं राहें..

Tuesday, December 10, 2013

'साज़..'





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"मेरे हाथों में जमा है अब तलक..
उसके नर्म हाथों का एहसास..

आँखों में गाढ़ा है अब तलक..
उसकी छुअन में लिप्त साज़..

कुछ एहसास..साज़..पिघल हुए..
नश्तर-से प्यारे..नासूर-से ख़ास..!!"

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--मियाद..साहिल..सब बेमाने..

Monday, December 2, 2013

'अनुभूति का वरदान..'


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"गोलार्ध से बहता अथाह समंदर मेरे महासागर को नयी दिशा दे रहा है.. आओ, थाम लो मेरा समर्पित जीवन और संचालित होने दो जीवन-प्रणाली..!!! जानती हूँ..कि तुम ही जानते हो मेरी व्यथा..!!"

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--अनुभूति का वरदान..रख लो मान..

Sunday, December 1, 2013

'तुम परिंदे हो..'




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"ये कैसी सज़ा मुकरर की..
खबर थी तुम्हें..

तूफां के बेशुमार पैमाने छीलते हैं हर नफज़ रूह मेरी..
उधेड़ते हैं झूठे-फ़रेबी रिश्ते तहज़ीब के फेरे..
मलते हैं नमक नासूर पे..मौसम घनेरे..
जड़ते हैं ख्वाहिशों पे इल्ज़ाम हर सवेरे..

तुम भी चले गए तो..
बिखर जाएगा वज़ूद..
सुलग जाएगा हर अंग..
टपकेगी हर रात छत..
उखड़ेगी हर पल वक़्त की सुई..

खैर..

तुम परिंदे हो..
जहाँ मर्ज़ी जाना..
मानता हूँ तुम्हें..
चाहे भुला जाना..!!"

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--संडेज़..वर्स्ट हिट्स..