Wednesday, December 11, 2013

'बेदख़ल होतीं राहें..'




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"खुशियाँ भी झूठी हैं..गम तो अपने रहने दो..!! सुनो, चाहे जितना दम लगा लेना..मुझसे न ले सकोगे अपनी रूह का हिस्सा..जो सिर्फ मेरा है..और ता-उम्र रहेगा..!!"

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--बेदख़ल होतीं राहें..

Tuesday, December 10, 2013

'साज़..'





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"मेरे हाथों में जमा है अब तलक..
उसके नर्म हाथों का एहसास..

आँखों में गाढ़ा है अब तलक..
उसकी छुअन में लिप्त साज़..

कुछ एहसास..साज़..पिघल हुए..
नश्तर-से प्यारे..नासूर-से ख़ास..!!"

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--मियाद..साहिल..सब बेमाने..

Monday, December 2, 2013

'अनुभूति का वरदान..'


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"गोलार्ध से बहता अथाह समंदर मेरे महासागर को नयी दिशा दे रहा है.. आओ, थाम लो मेरा समर्पित जीवन और संचालित होने दो जीवन-प्रणाली..!!! जानती हूँ..कि तुम ही जानते हो मेरी व्यथा..!!"

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--अनुभूति का वरदान..रख लो मान..

Sunday, December 1, 2013

'तुम परिंदे हो..'




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"ये कैसी सज़ा मुकरर की..
खबर थी तुम्हें..

तूफां के बेशुमार पैमाने छीलते हैं हर नफज़ रूह मेरी..
उधेड़ते हैं झूठे-फ़रेबी रिश्ते तहज़ीब के फेरे..
मलते हैं नमक नासूर पे..मौसम घनेरे..
जड़ते हैं ख्वाहिशों पे इल्ज़ाम हर सवेरे..

तुम भी चले गए तो..
बिखर जाएगा वज़ूद..
सुलग जाएगा हर अंग..
टपकेगी हर रात छत..
उखड़ेगी हर पल वक़्त की सुई..

खैर..

तुम परिंदे हो..
जहाँ मर्ज़ी जाना..
मानता हूँ तुम्हें..
चाहे भुला जाना..!!"

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--संडेज़..वर्स्ट हिट्स..

Saturday, November 30, 2013

'असीम उत्साह..'






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"रंग अब तक सूखे नहीं..
दो बरस से अधिक समय बीत गया..
अंतस में जमी कोमल चादर की पत्तियाँ..सींचती हैं सुबह से साँझ तक..
बल के साथ असीम उत्साह भी..

जीवन के पथ जब विस्तार माँगने लगे हैं..बिछुड़ना आवश्यक हो चला है..
समय के वेग के आगे नि:शब्द और स्तब्ध हैं सारे मौन और प्रायोगिक पारितोष..!!

समय और स्मृति..
अथाह हो तो भी क्या..
अपूर्ण होती है सुगंध..
पुष्प की पंखुड़ियों की छाया के बिना..!!"

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--शांत..निर्मल क्षण जीवन का बोध कराते हैं..

Thursday, November 28, 2013

'ओढ़ लें..'













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"मेरी जां..

तुमसे ही सुबह होती है..
तुमसे ही शाम..

जिस दिन सोचूँ..न करूँ परेशां..
उस दिन ही होते हो..
तुम सबसे ज्यादा परेशां..

ऐसा क्या है हम दोनों के बीच..
लेता है रंग जो स्याह अंधेरों के बीच..

पहर सारे रात-भर रोशनी मंगातें हैं..
हमसे गरमी के सारे अलाव जलाते हैं..

सूत की चादर और सिलवटों के लिहाफ़..
सजाते हैं हमसे..उल्फ़त के खिताब..

पोर से रिसते बेशुमार टापू..
सीखा हमसे है होना बेकाबू..

आज़ादी का जश्न तेरी बाँहों में..
गिरफ़्त का सुकून तेरी आहों में..

राज़ तेरे-मेरे..दांव पे ज़िन्दगी..
आ ओढ़ लें..रूह की दीवानगी..!!"

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--कुछ ख़त जो भेज न पाए उन्हें..

'दर्द के स्याह प्याले..'




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"मन बहुत उदास है आज..
तुम जो नहीं हो पास..

फ़रक अब होता नहीं..
तंज़ कोई कसता नहीं..

चली जाऊँगी दिल से..
ना ढूँढना हर तिल में..

न आओगे जानती हूँ..
सताया है..मानती हूँ..

न आये पैग़ाम समझ लेना..
किस्सा हुआ तमाम जान लेना..!!!"

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--दर्द के स्याह प्याले..

Friday, November 22, 2013

'लकीरों की चाहत..'










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"तुम मेरी ज़िन्दगी का नहीं..मेरा एक अटूट हिस्सा बन चुके हो.. हर नफ्ज़ मुझमें शामिल रहते हो..कहीं भी जाऊँ, साँसें महकाते हो..कितने ही गहरे हों स्याह रात के साये, अपनी बाँहों में छुपा दर्द पिघला देते हो..!!!

आओ, उड़ जाते हैं भुला दुनिया..रवायत.. महसूस करते हैं लकीरों की चाहत..!!"

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Thursday, November 21, 2013

'बेइंतिहा मोहब्बत..'




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"इक तेरा जिस्म..
इक मेरी रूह..

रूह का जिस्म..
जिस्म की रूह..

मेरा क्या..
सब कुछ तेरा..

तेरा क्या..
जो कुछ मेरा..

बंधन सदियों पुराना..
पुराना-सा इक बंधन..

पोर की गर्माहट..
गर्माते पोर..

सुलगती आहें..
आहों में सुलगती..

बाँहों की गिरफ़्त..
गिरफ़्त में बाँहें..

अर्धचक्र में ख़ुमारी..
ख़ुमारी से अर्धचक्र..

इक तुम जानो..
इक मैं जानूँ..!!!"

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--बेइंतिहा मोहब्बत करते हैं हम आपसे..

'तुम..मैं..'





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"खुशबू..
सुगंध..

याद..
स्मृति..

जज़्बात..
भावना..

नक़्श..
चिन्ह..

तुम..
मैं..

क्षितिज..
उफ़्क..

नशा..
ख़ुमार..

प्रिय..
जां..

आत्मा..
रूह..

मैं..
तुम..!!"

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--इत्र..बाँहें..आलिंगन..पाक..नफ़्स..बख्त़..

Sunday, November 17, 2013

'समर्पण की खुशहाली..'





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"जीवन की परिभाषा ऐसी..
किसने बनायी है..
क्यूँ बेटी अपने घर से ही..
हुई परायी है..

काश! समझते जो बनाते..
ताने-वाने..
जीवन में समर्पण की खुशहाली..
एक वो ही लायी है..!!"

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'भारत-माँ..'




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"सर जी..आप सदैव सत्य लिखते हैं..
देश की राजनीतिक बीमारी पर तीर कसते हैं..

आज मुझे..ज़रा ये भी तो बताइए..
कितने यहाँ आपकी-मेरी बात सुनते हैं..

क्यूँ उनको असर होता नहीं..
शहीद उनका कोई होता नहीं..

क्या फितरत हो चली राष्ट्र-नेताओं की..
बिन पैसे कुछ होता नहीं..

आखिर कब तक ये किस्सा चलेगा..
आखिर कब तक इन्साफ बिकेगा..

न कल कुछ हुआ है..ना आगे कुछ होगा..
६६ वर्ष बाद भी असह्य-सा देश-ह्रदय होगा..

चीरते हैं अपने ही कुछ पाक-पुजारी..
कितनी रातें सैनिकों ने जागे गुजारीं..

कौन लिखेगा ऐसी क़ुरबानी..
बाकी कहाँ खून में रवानी..

शर्मिंदा हूँ..न रख सका भारत-माँ की लाज..
ए-माँ..गुनाह मेरा भी है..न करना मुझे माफ़..!!"

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'नाराज़ हूँ आपसे..'






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"जाइये..नाराज़ हूँ आपसे..नहीं करनी कोई बात..!! मेरे किसी सवाल का जवाब नहीं देते..अब, जब तक आप हर सवाल का जवाब विस्तार से नहीं देंगे..मुझे कोई और बात नहीं सुननी..!!!!

वैसे भी, २ दिन बाद तो अगले १० दिन तक नहीं नहीं मिलेंगे मेरे निशां.. शायद, बढ़ भी जाए समय की ये अल्प-अवधि..!!

"जानते थे हम..
न होगी सुनवाई..
जाने क्यूँ फिर..
आस लगाईं..!!"

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--रूह सैडी-सैडी..

'माँ का लाल..'






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"जाने कितने असंतुष्ट हुए..
जाने कितने शत्रु होंगे..
सोचूँ गर सबके लिए..
पूरे न कभी स्वप्न होंगे..

इसीलिए बढ़ता गया..
थकता गया..चलता गया..
न शब्द थे..न कोई सहाय..
अपना विकास करता गया..

अधिकार मेरा है और रहेगा..
कर लेना तुम सारे जतन..
अपनी माँ का लाल हूँ..
मिट आया मैं अपने वतन..!!!"

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Tuesday, October 29, 2013

'गिरफ़्त..'








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"तेरे दिल में बसता हूँ..जानम..
तेरी हर साँस में सुन शोर मेरा..
करने दो एक बार फिर..
इक कोशिश नाकाम-सी..
क्या बांधेगा रवायतों का टोला..
तेरी गिरफ़्त में क़ैद..
मेरी हर आज़ादी है..!!"

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'प्रार्थना..'





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"हर पल ख़ुदको नम रखना..
पास न कोई गम रखना..
जानते हैं वो अंतर्मन की बातें..
प्रार्थना में अपनी दम रखना..!!"

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Sunday, October 27, 2013

'आठ..'





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"जां..आज कितने दिनों बाद 'आठ' बजे हैं.. जैसे वक़्त रुक गया था न इस दरमियां, जब थी दुनिया दरमियां..!!

चलो, आज शब न आने दें किसी को दरमियां.. वक़्त नापे ख़ुद वक़्त को..और..वक़्त ही ना हो दरमियां..!!"

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--थॉट एट 'एट'..

Friday, October 18, 2013

'वीकैंड मेनिया..'





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"क्या तुमने सुनी हैं मेरी धड़कनें कभी..
सुलगे हो अंगारों की सेज पे कभी..
दहाड़े मार-मार रोये हो कभी..
रात भर ख़त लिखते-मिटाते रहे हो कभी..

नहीं न..

फिर तुम समझ नहीं सकते..

मेरी रूह की गहराई..
मेरी इबादत का जुनूं..
मेरे जिस्म के निशां..
मेरे पोरों की गर्माहट..

जाओ..

और भी हैं..
महफ़िल में तुम्हारे..

इक हम नहीं..
तो गम नहीं..!!"

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--वीकैंड मेनिया..

Wednesday, October 16, 2013

'स्याह जज़्बात..'





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"सफ़र की पहली मंजिल..
हमसफ़र की दूसरी दहलीज़..
दरख्त की तीसरी रहगुज़र..
कागज़ की चौथी निशानी..

सुर्ख़ सैलाब सिमट जायेंगे..!!"


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--स्याह जज़्बात..रूह की सबसे नीचे वाली बैंच पर..

'प्रेम के अर्थ..'






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"क्या प्रेम में मिलना ही सब कुछ है..?? इसकी अनुभूति स्वयं में इतनी प्रबल है कि किसी और व्यक्ति या वस्तु विशेष का कोई स्थान शेष ही नहीं रहता..कोई रिक्तता का प्रश्न ही नहीं..!!! जाने क्यूँ..कुछ जन इस 'प्रेम' के इतने अर्थ कहाँ से ले आते हैं..??

वैसे भी, जीवन में पाना ही सब कुछ नहीं होता.. भोजन के स्वाद का सही माप तो दूसरे को चखा कर ही ज्ञात होता है.. है ना..??"

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--सिली पीपल..

Wednesday, October 9, 2013

'जिस्मों की रीलें..'







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"इस रूह से उठा..
उस रूह चला..
फ़ासले पाटता कैसा गिला..
जो तुम नहीं कोई ख्वाइश कहाँ..
मैं दीवाना..आवारा..
दश्तो-सहरा बिखरता रहा..
चल उठायें तम्बू की कीलें..
जाने कबसे पुकारती जिस्मों की रीलें..!!"

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Sunday, October 6, 2013

'कभी..'








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"खलती है कमी इक तेरी..
रूह पूछती है सवाल कई..
किसका जवाब दूँ..
किससे राह पूछूँ..
कौन आयेगा यहाँ कभी..

मर्ज़ी इक तेरी..
दहशतगर्दी इक मेरी..
साँस की डोरी..
कच्ची रही..
यूँ ही..
क्या समझेगा कोई कभी..!!"

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Saturday, September 28, 2013

'तोहफा..'








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"सुनो जानां..

मेरा बर्थडे आने वाला है..तुम्हें याद है न..??? इस बार मैं तोहफा देना चाहती हूँ..इक ऐसा तोहफा जो तुम अपनी रूह में..हर पल खिलता-पनपता पाओगे..सजाओगे जब भी ख़ुद को आईने के सामने..नज़रें मेरी ख़ुद पर ही पाओगे.. छुओगे जब कभी दरिया को..छुअन मेरी ही पाओगे.. सहलाओगे जब कभी सिर..मुझे ही अपनी गोदी में पाओगे.. बाँधोगे कलाई पर जब कभी वो घड़ी..वक़्त मेरा ही पाओगे.. निभाओगे रिश्ते जब कभी..हर शख्स में इक मुझे ही पाओगे..!!!


इंतज़ार करेंगे हम-तुम उस शब का..जब से गिरफ़्त में ख़ुद को कसा पाओगे..!!! जानती हूँ, तुम चाहते हो..मैं भर लूँ तुम्हें बाँहों में और बहते रहें बरसों-से क़ैद अश्क सारे..!!"

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---बर्थडे मंथ बस आने को है..

Tuesday, September 24, 2013

'मेरे रंगरेज़..'





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"जा रंग ले..
खूं से रूह के लिबास अपने..

यूँ भी मैं शामिल रहूँगा..
हर अल्फ़ाज़ में तेरे..

बहुत गहरे हैं..
चाहत के घेरे..
ना टूटेंगे..
ये चंद फेरे..

जा..मेरे रंगरेज़..
रंग ले..

मेरे जिस्म से..
वफ़ा के माने..
ना मिलेंगे..
कोई हमसे बेगाने..!!"

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Monday, September 9, 2013

'क्षमा-याचना..'

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"पर्वाधिराज पर्युषण जी के आगमन पर मन सदैव उल्लासित रहता है..अनंत-काल से एकत्रित अष्ट-कर्मों को क्षय करने का सु-अवसर मिलता है..!!! और समापन पर एक विशेष उपहार--'संवात्सरिक प्रतिकमण' करके समस्त प्राणी-मात्र से क्षमा माँगने का दुर्लभ संयोग, जो अन्य दिवसों में संभव नहीं..

चौरासी लाख जीव-योनियों से हाथ जोड़कर मन-वचन-काया द्वारा हुई अनगिनत त्रुटियों के लिए क्षमा-याचना करते हैं..खमत-खामना..!!!"

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