Monday, January 6, 2014
'वादा-ए-उम्र..'
...
"सुनो, मुझे चाहना मुमकिन कहाँ..
टूटा दिल जुड़ना मुमकिन कहाँ..१..
तनहा हूँ..तनहा रहने दो..जो मिले तुम..
किनारों को उलटना मुमकिन कहाँ..२..
तुम जानते थे मजबूरियां..फ़क़त..
निभाना वादा-ए-उम्र मुमकिन कहाँ..३..
चले जाओ साकी..हासिल ख़ुशी..
मेरे कूचे..देखो..अब मुमकिन कहाँ..४..
अज़ीज़ रुक्सत..हम-जलीस ग़ैर..
आवारा नसीब..मोहब्बत मुमकिन कहाँ..५..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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1/06/2014 05:52:00 AM
6
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ग़ज़ल..
Wednesday, January 1, 2014
'ज़ालिम टुकड़े..'

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"कितने करीने से..कितने सलीके से बिखरते हैं..हर ओर..!! जहाँ भी जाऊँ..पीछा करते हैं.. कार के डैशबोर्ड पर..स्टडी टेबल के ग्लास पर..मोबईल की स्क्रीन पर..डाईनिंग मैट्स पर..मार्बल फ्लोरिंग पर.. किताबों के शैल्फ़ पर..
कितने वफ़ादार हैं..ये टूटे हुए सपनों के ज़ालिम टुकड़े..!!!"
...
--रहगुज़र तलाशते ख़ानाबदोश..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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1/01/2014 05:16:00 AM
4
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बेज़ुबां ज़ख्म..
Monday, December 30, 2013
'धरती-माँ..'
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"बहुत हुए 'जां' के नाम स्टेटस..आज कुछ अलग होगा..
'वज़ूद..पहचान..ईमान तुझसे है..
शुक्रगुजार हूँ..साँसें तुझसे हैं..
कतरा लहू का..बहा दूँगा..
मेरी शान..ए-वतन..तुझसे है..
पा तुझे ज़िन्दगी है पायी..
रवानी..कहानी तुझसे है..
मकां..दुकां..दो वक़्त रोटी..
चादर-ए-इनायत तुझसे है..
गुरूर क्या करूँ झूठे तन पे..
क़फ़न की दरकार तुझसे है..
पेशानी पे माटी सजे..भारत-माँ..
हर शै की आज़ादी तुझसे है..!!'
धरती-माँ की शान में यूँ ही कुछ शब्द..!!"
...
कृपया बहर..रदीफ़..मतला..मीटर..सब को आराम करने दीजिये आज.. :-)
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/30/2013 10:10:00 PM
2
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देश-प्रेम..
Thursday, December 26, 2013
'दर्द और आगोश..'

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"कोहरा पंख फैलाए बैठा रहता है..हर रोज़ कहता है, "आओ, तुम्हें तुम्हारी 'जां' से मिलवा लाऊँ दुनिया की नज़रों से छिपा कर.. क्यूँ तड़पते हो दिन-रात..?? जाओ, भर लो ना आगोश में जो तुम बिन जी नहीं सकते..!!"
हमने कहा, "सुनिए, कोहरा महाशय..दर्द और आगोश अब दोस्त नहीं रहे.. हम उनके नहीं हो सके.. शायद, वो भी हमें न भुला सके..!! पर मियाद पूरी हो गयी..!! वक़्त के साथ सब बह गया..जो रह गया वो मैं हूँ..!!! टूटा..बिखरा..बर्बाद..बेज़ुबां..बेगैरत..तनहा..फ़क़त मैं..!!"
मान जाओ, कोहरा बाबू.. कुछ नहीं रखा इन सब में..!! जाओ, अपना कर्तव्य निभाओ..!!"
...
--तुम बिन दिल जिंदा नहीं अब..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/26/2013 10:25:00 AM
7
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बेज़ुबां ज़ख्म..
Sunday, December 22, 2013
'वो मैं था..'

...
"सब कुछ जो असंभव हुआ करता था..
आज संभव हो चला..
मैं जिस राह का पथिक न था..
वहाँ राज करने लगा..
मेरा भाव किसने जाना..
मैं रोधक तुम्हारा होने लगा..
न पढ़ सकोगे कभी..
अंतर्मन लिपि..
तुम्हारी दृष्टि में..
अपराधी जो हो गया..
समय का दोष था..
या..
परिस्थिति का रोग..
जो पिसा..मिटा..
वो मैं था..
हाँ..
वो मैं ही था..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
12/22/2013 09:05:00 AM
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बेज़ुबां ज़ख्म..
'स्याह दूरियां..'

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"जब-जब WhatsApp पर कोई मैसेज आता है.. वो पल आँखों में कितने सपने सजा जाता है..!! याद है न--'एक सौ सोलह चाँद की रातें..'....'एक तुम्हारे काँधे का तिल..'...
उसी काले तिल का एहसास..तुम्हारी छुअन का वो खूबसूरत लम्हा..रूह को तड़पा जाता है..!!"
...
--स्याह दूरियां..बेबस आसमां..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/22/2013 08:42:00 AM
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मेहमां यादें..
Wednesday, December 18, 2013
'किस्सा..'

"करीब आना फ़ासले बढ़ाना..
मुमकिन कहाँ..तुम्हें भुलाना..
अधूरी हूँ..अधूरा ही रहने देना..
किस्सा जो हुई..किस्से होंगे..
टूटी कश्ती के किनारे बैठा..
मुर्दे माफ़िक़ मेरा गुरूर ऐंठा..
पिघल रही..बह रही..आज फिर..
सम्भाल लो..मेरे ज़ुल्मी मुसाफिर..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/18/2013 09:30:00 AM
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रूमानियत..
'आँखें..'

...
"कितने राज़ खोलती है..
कितने समेटती है..
तुम्हारी हर बात..
जाने क्या बोलती है..
मैं सुन भी न पाऊँ..
फिर भी थामे रखती है..
उदास कहूँ या अलहड़..
कितनी अंदर झकझोरती है..
तुम क्या जानोगे..
सच ना मानोगे..
संयोग से मिलना..देखो..
आँखें कैसे पुचकारती हैं..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/18/2013 07:27:00 AM
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रूमानियत..
Monday, December 16, 2013
'हर्फ़..'

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"मेरी किस्मत..वहशत..तन्हाई..
हर्फ़ रुक जाओ..
कुछ देर तुम ही मेरे करीब बैठ जाओ..
कोई नहीं रहा यहाँ..अब जाऊँ कहाँ..
किस्से मेरे बिकते हर रोज़..
मैं बैगैरत..आवारा रहूँ..
इतनी दुआ अता करना..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/16/2013 10:02:00 AM
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बेज़ुबां ज़ख्म..
Sunday, December 15, 2013
'ज्वनशील तत्व..'

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"हम कभी-कभी कितने बेबस हो जाते हैं न.. आज चाहते हुए भी किसी की फोटो लाईक नहीं कर सकती, वैसे अच्छा ही है.. दो शब्द अगर तारीफ़ के लिख दूँगी तो अपनापन बढ़ जाएगा और फिर जाने कितने भाव उमड़ आयेंगे..
और फिर..कितने ज्वनशील तत्व उत्पात मचायेंगे..!!!
जीवन-धारा को बहने देती हूँ..
अपनी डगर पर चलती रहती हूँ..
मेरी पसंद-नापसंद से क्या होना है..
मैं अक्सर..यूँ ही कहती रहती हूँ..!!"
...
--कुछ सन्देश जो दिल से दिमाग तक पहुँचने में बहुत समय लगाते हैं..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/15/2013 09:42:00 AM
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ज़िन्दगी..
Thursday, December 12, 2013
'पत्र की पात्रता..'

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"वो मिठास कहाँ..
धैर्य और प्रेम का वो संगम कहाँ..
विश्वास की मजबूत धरोहर कहाँ..
सब बह गया..
समय की धार में..
सुन्दर..मोती-से अक्षर बोलें कहाँ..
पत्र की पात्रता ही सुरक्षित कहाँ..!!"
...
--सुनहरी स्मृतियाँ..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/12/2013 10:22:00 AM
11
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स्मृति..
Wednesday, December 11, 2013
'बेदख़ल होतीं राहें..'

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"खुशियाँ भी झूठी हैं..गम तो अपने रहने दो..!! सुनो, चाहे जितना दम लगा लेना..मुझसे न ले सकोगे अपनी रूह का हिस्सा..जो सिर्फ मेरा है..और ता-उम्र रहेगा..!!"
...
--बेदख़ल होतीं राहें..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/11/2013 08:28:00 AM
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ज़मीनी हकीक़त..
Tuesday, December 10, 2013
'साज़..'

"मेरे हाथों में जमा है अब तलक..
उसके नर्म हाथों का एहसास..
आँखों में गाढ़ा है अब तलक..
उसकी छुअन में लिप्त साज़..
कुछ एहसास..साज़..पिघल हुए..
नश्तर-से प्यारे..नासूर-से ख़ास..!!"
...
--मियाद..साहिल..सब बेमाने..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/10/2013 08:30:00 AM
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बेज़ुबां ज़ख्म..
Monday, December 2, 2013
'अनुभूति का वरदान..'

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"गोलार्ध से बहता अथाह समंदर मेरे महासागर को नयी दिशा दे रहा है.. आओ, थाम लो मेरा समर्पित जीवन और संचालित होने दो जीवन-प्रणाली..!!! जानती हूँ..कि तुम ही जानते हो मेरी व्यथा..!!"
...
--अनुभूति का वरदान..रख लो मान..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/02/2013 08:58:00 AM
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रूमानियत..
Sunday, December 1, 2013
'तुम परिंदे हो..'

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"ये कैसी सज़ा मुकरर की..
खबर थी तुम्हें..
तूफां के बेशुमार पैमाने छीलते हैं हर नफज़ रूह मेरी..
उधेड़ते हैं झूठे-फ़रेबी रिश्ते तहज़ीब के फेरे..
मलते हैं नमक नासूर पे..मौसम घनेरे..
जड़ते हैं ख्वाहिशों पे इल्ज़ाम हर सवेरे..
तुम भी चले गए तो..
बिखर जाएगा वज़ूद..
सुलग जाएगा हर अंग..
टपकेगी हर रात छत..
उखड़ेगी हर पल वक़्त की सुई..
खैर..
तुम परिंदे हो..
जहाँ मर्ज़ी जाना..
मानता हूँ तुम्हें..
चाहे भुला जाना..!!"
...
--संडेज़..वर्स्ट हिट्स..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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12/01/2013 08:48:00 AM
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बेज़ुबां ज़ख्म..
Saturday, November 30, 2013
'असीम उत्साह..'
...
"रंग अब तक सूखे नहीं..
दो बरस से अधिक समय बीत गया..
अंतस में जमी कोमल चादर की पत्तियाँ..सींचती हैं सुबह से साँझ तक..
बल के साथ असीम उत्साह भी..
जीवन के पथ जब विस्तार माँगने लगे हैं..बिछुड़ना आवश्यक हो चला है..
समय के वेग के आगे नि:शब्द और स्तब्ध हैं सारे मौन और प्रायोगिक पारितोष..!!
समय और स्मृति..
अथाह हो तो भी क्या..
अपूर्ण होती है सुगंध..
पुष्प की पंखुड़ियों की छाया के बिना..!!"
...
--शांत..निर्मल क्षण जीवन का बोध कराते हैं..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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11/30/2013 06:42:00 AM
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ज़मीनी हकीक़त..
Thursday, November 28, 2013
'ओढ़ लें..'
...
"मेरी जां..
तुमसे ही सुबह होती है..
तुमसे ही शाम..
जिस दिन सोचूँ..न करूँ परेशां..
उस दिन ही होते हो..
तुम सबसे ज्यादा परेशां..
ऐसा क्या है हम दोनों के बीच..
लेता है रंग जो स्याह अंधेरों के बीच..
पहर सारे रात-भर रोशनी मंगातें हैं..
हमसे गरमी के सारे अलाव जलाते हैं..
सूत की चादर और सिलवटों के लिहाफ़..
सजाते हैं हमसे..उल्फ़त के खिताब..
पोर से रिसते बेशुमार टापू..
सीखा हमसे है होना बेकाबू..
आज़ादी का जश्न तेरी बाँहों में..
गिरफ़्त का सुकून तेरी आहों में..
राज़ तेरे-मेरे..दांव पे ज़िन्दगी..
आ ओढ़ लें..रूह की दीवानगी..!!"
...
--कुछ ख़त जो भेज न पाए उन्हें..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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11/28/2013 08:19:00 AM
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बेबाक हरारत..
'दर्द के स्याह प्याले..'

...
"मन बहुत उदास है आज..
तुम जो नहीं हो पास..
फ़रक अब होता नहीं..
तंज़ कोई कसता नहीं..
चली जाऊँगी दिल से..
ना ढूँढना हर तिल में..
न आओगे जानती हूँ..
सताया है..मानती हूँ..
न आये पैग़ाम समझ लेना..
किस्सा हुआ तमाम जान लेना..!!!"
...
--दर्द के स्याह प्याले..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
11/28/2013 08:05:00 AM
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बेज़ुबां ज़ख्म..
Friday, November 22, 2013
'लकीरों की चाहत..'

...
"तुम मेरी ज़िन्दगी का नहीं..मेरा एक अटूट हिस्सा बन चुके हो.. हर नफ्ज़ मुझमें शामिल रहते हो..कहीं भी जाऊँ, साँसें महकाते हो..कितने ही गहरे हों स्याह रात के साये, अपनी बाँहों में छुपा दर्द पिघला देते हो..!!!
आओ, उड़ जाते हैं भुला दुनिया..रवायत.. महसूस करते हैं लकीरों की चाहत..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
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11/22/2013 08:49:00 AM
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बेबाक हरारत..
Thursday, November 21, 2013
'बेइंतिहा मोहब्बत..'
>

...
"इक तेरा जिस्म..
इक मेरी रूह..
रूह का जिस्म..
जिस्म की रूह..
मेरा क्या..
सब कुछ तेरा..
तेरा क्या..
जो कुछ मेरा..
बंधन सदियों पुराना..
पुराना-सा इक बंधन..
पोर की गर्माहट..
गर्माते पोर..
सुलगती आहें..
आहों में सुलगती..
बाँहों की गिरफ़्त..
गिरफ़्त में बाँहें..
अर्धचक्र में ख़ुमारी..
ख़ुमारी से अर्धचक्र..
इक तुम जानो..
इक मैं जानूँ..!!!"
...
--बेइंतिहा मोहब्बत करते हैं हम आपसे..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
11/21/2013 08:22:00 AM
7
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बेबाक हरारत..
'तुम..मैं..'

...
"खुशबू..
सुगंध..
याद..
स्मृति..
जज़्बात..
भावना..
नक़्श..
चिन्ह..
तुम..
मैं..
क्षितिज..
उफ़्क..
नशा..
ख़ुमार..
प्रिय..
जां..
आत्मा..
रूह..
मैं..
तुम..!!"
...
--इत्र..बाँहें..आलिंगन..पाक..नफ़्स..बख्त़..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
11/21/2013 06:46:00 AM
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रूमानियत..
Sunday, November 17, 2013
'समर्पण की खुशहाली..'

...
"जीवन की परिभाषा ऐसी..
किसने बनायी है..
क्यूँ बेटी अपने घर से ही..
हुई परायी है..
काश! समझते जो बनाते..
ताने-वाने..
जीवन में समर्पण की खुशहाली..
एक वो ही लायी है..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
11/17/2013 07:42:00 AM
16
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ज़मीनी हकीक़त..
'भारत-माँ..'
...
"सर जी..आप सदैव सत्य लिखते हैं..
देश की राजनीतिक बीमारी पर तीर कसते हैं..
आज मुझे..ज़रा ये भी तो बताइए..
कितने यहाँ आपकी-मेरी बात सुनते हैं..
क्यूँ उनको असर होता नहीं..
शहीद उनका कोई होता नहीं..
क्या फितरत हो चली राष्ट्र-नेताओं की..
बिन पैसे कुछ होता नहीं..
आखिर कब तक ये किस्सा चलेगा..
आखिर कब तक इन्साफ बिकेगा..
न कल कुछ हुआ है..ना आगे कुछ होगा..
६६ वर्ष बाद भी असह्य-सा देश-ह्रदय होगा..
चीरते हैं अपने ही कुछ पाक-पुजारी..
कितनी रातें सैनिकों ने जागे गुजारीं..
कौन लिखेगा ऐसी क़ुरबानी..
बाकी कहाँ खून में रवानी..
शर्मिंदा हूँ..न रख सका भारत-माँ की लाज..
ए-माँ..गुनाह मेरा भी है..न करना मुझे माफ़..!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
11/17/2013 07:21:00 AM
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ज्वलनशील-कथन..
'नाराज़ हूँ आपसे..'

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"जाइये..नाराज़ हूँ आपसे..नहीं करनी कोई बात..!! मेरे किसी सवाल का जवाब नहीं देते..अब, जब तक आप हर सवाल का जवाब विस्तार से नहीं देंगे..मुझे कोई और बात नहीं सुननी..!!!!
वैसे भी, २ दिन बाद तो अगले १० दिन तक नहीं नहीं मिलेंगे मेरे निशां.. शायद, बढ़ भी जाए समय की ये अल्प-अवधि..!!
"जानते थे हम..
न होगी सुनवाई..
जाने क्यूँ फिर..
आस लगाईं..!!"
...
--रूह सैडी-सैडी..
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
11/17/2013 06:55:00 AM
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बेबाक हरारत..
'माँ का लाल..'

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"जाने कितने असंतुष्ट हुए..
जाने कितने शत्रु होंगे..
सोचूँ गर सबके लिए..
पूरे न कभी स्वप्न होंगे..
इसीलिए बढ़ता गया..
थकता गया..चलता गया..
न शब्द थे..न कोई सहाय..
अपना विकास करता गया..
अधिकार मेरा है और रहेगा..
कर लेना तुम सारे जतन..
अपनी माँ का लाल हूँ..
मिट आया मैं अपने वतन..!!!"
...
Writer/शब्दों के कारोबारी..
priyankaabhilaashi
at
11/17/2013 06:53:00 AM
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देश-प्रेम..
